10 सितंबर 2026 को पेरिस में हो रहे International Space Summit के बीच एक कमरे में ISRO चेयरमैन डॉ. वी. नारायणन और ESA के डायरेक्टर जनरल जोसेफ आशबाकर ने कुछ कागज़ों पर दस्तखत किए और आपस में बदले। यही औपचारिकता ISRO-ESA के 24 साल पुराने समझौते को अगले छह साल के लिए बढ़ा गई।
पेरिस में क्या हुआ
ISRO की वेबसाइट के मुताबिक यह एक्सचेंज ऑफ लेटर्स के ज़रिए हुआ और मौजूदा ISRO-ESA Cooperative Agreement को 8 जनवरी 2032 तक वैध कर गया। यह पहले से चल रहे सहयोग को जारी रखने के साथ-साथ नए क्षेत्रों के लिए भी दरवाज़ा खोलता है।
| बिंदु | जानकारी |
|---|---|
| नई वैधता | 8 जनवरी 2032 तक |
| दस्तखत की जगह और तारीख | पेरिस, 10 सितंबर 2026 |
| मूल समझौता | जनवरी 2002 से लागू |
| ISRO की तरफ से | डॉ. वी. नारायणन |
| ESA की तरफ से | जोसेफ आशबाकर |
समझौते के पीछे 24 साल पुरानी कहानी
ISRO के मुताबिक दोनों एजेंसियों के बीच अनौपचारिक सहयोग 1978 से चला आ रहा है, जबकि औपचारिक Cooperative Agreement जनवरी 2002 में लागू हुआ। यानी 2002 में जब यह समझौता शुरू हुआ था, तब ISRO ने Chandrayaan-1 का नाम भी तय नहीं किया था, जो 2008 में लॉन्च हुआ।
पिछले दो दशकों में यह सहयोग मुख्यतः Earth observation, satellite navigation, space science और मिशन सपोर्ट तक सीमित था। अब इसका दायरा साफ तौर पर बड़ा हो गया है।
ISRO के मुताबिक दोनों एजेंसियों ने 2025 में human exploration पर एक Joint Statement of Intent भी साइन किया था, जिसमें एस्ट्रोनॉट ट्रेनिंग, मिशन इम्प्लीमेंटेशन और रिसर्च एक्सपेरिमेंट जैसे विषय शामिल थे। इसी कड़ी में ESA ने Axiom-4 जैसे मिशनों पर संयुक्त गतिविधियों में भी दिलचस्पी दिखाई थी।
नए समझौते में क्या नया जुड़ा
ISRO के बयान के अनुसार नए दायरे में human और robotic exploration, space weather यानी सौर गतिविधि से जुड़ा खतरा, और sustainability of space activities यानी टिकाऊ अंतरिक्ष गतिविधियां शामिल की गई हैं।
- Human exploration: इंसानों को अंतरिक्ष में भेजने वाले मिशन
- Robotic exploration: बिना क्रू वाले प्रोब और स्पेसक्राफ्ट
- Space weather: सौर तूफानों से सैटेलाइट और पावर ग्रिड को खतरा
- Sustainability: बढ़ते स्पेस डेब्रिस और भीड़भाड़ वाली ऑर्बिट का प्रबंधन
Space weather असल में सूरज से निकलने वाले चार्ज्ड कणों और सौर तूफानों का असर है, जो सैटेलाइट, GPS जैसी नेविगेशन सेवाओं और यहां तक कि बिजली ग्रिड तक को नुकसान पहुंचा सकते हैं। जितने ज़्यादा सैटेलाइट ऊपर हैं, यह चेतावनी सिस्टम उतना ही ज़रूरी होता जा रहा है।
Sustainability यानी टिकाऊ अंतरिक्ष गतिविधियां भी इसी वजह से जुड़ी हैं। बढ़ते स्पेस डेब्रिस से सैटेलाइट को बचाने का काम ISRO पहले से कर रहा है, और ESA के साथ डेटा शेयरिंग से यह प्रक्रिया और बेहतर हो सकती है।
भारत के लिए इसका सीधा फायदा
superkalam की रिपोर्ट के मुताबिक ISRO और ESA के बीच Gaganyaan मिशनों के लिए ग्राउंड ट्रैकिंग सपोर्ट पर एक Technical Implementing Plan पहले ही साइन हो चुका है। इससे भारत के अपने Space Station प्रोग्राम को भी तकनीकी मदद मिलने की उम्मीद है।
ग्राउंड ट्रैकिंग का मतलब है दुनिया भर में फैले एंटीना स्टेशनों से क्रू मॉड्यूल से लगातार संपर्क बनाए रखना। भारत के अपने ट्रैकिंग स्टेशन दुनिया के हर कोने को कवर नहीं करते, इसलिए ESA जैसे साझेदार की मदद इंसानों को अंतरिक्ष में भेजते वक्त सुरक्षा के लिहाज़ से अहम हो जाती है।
दोनों एजेंसियां भारत के Venus Orbiter Mission पर संभावित सहयोग को लेकर भी बातचीत कर रही हैं। हमें लगता है कि अगर यह सहयोग आगे बढ़ता है, तो ISRO को शुक्र मिशन के लिए महंगे विदेशी उपकरण या डेटा शेयरिंग में लागत बचाने का मौका मिल सकता है।
चांद और गहरे अंतरिक्ष के मामलों में भी सहयोग बढ़ेगा। NASA के Moon Base प्लान में ISRO की भूमिका पहले से चर्चा में है, अब ESA के साथ robotic exploration पर भी बातचीत का रास्ता खुल गया है।
Earth Observation वाला पहलू
ISRO के मुताबिक मार्च 2026 में दोनों एजेंसियों ने Earth observation मिशनों के लिए joint calibration और validation activities पर अलग समझौता भी किया था। कैलिब्रेशन यह पक्का करता है कि सैटेलाइट के आंकड़े सही और भरोसेमंद हों।
भारत के लिए यह अहम है क्योंकि NISAR जैसे रडार मिशन से मिलने वाला डेटा खेती, मौसम और आपदा प्रबंधन में इस्तेमाल होता है, और उसकी सटीकता जांचने के लिए बाहरी एजेंसी का सहयोग काम आता है।
ISRO के मुताबिक यह EO कैलिब्रेशन समझौता उस साझेदारी की अगली कड़ी है जो 1978 से चली आ रही है, जब भारत के पास आज जैसे बड़े सैटेलाइट भी नहीं थे। एक तरह से यह बताता है कि यह रिश्ता कितना पुराना और स्थायी है।
जो अभी साफ नहीं, आगे क्या देखें
अभी तक Venus Orbiter Mission या human spaceflight सहयोग की कोई ठोस समयसीमा या बजट सार्वजनिक नहीं हुआ है। यह सिर्फ एक व्यापक फ्रेमवर्क है, ठोस मिशन-दर-मिशन समझौते अलग से होंगे।
- Venus Orbiter Mission पर ISRO-ESA सहयोग की डिटेल कब सामने आती है
- Gaganyaan ट्रैकिंग सपोर्ट का असल इस्तेमाल कब शुरू होता है
- space weather पर साझा चेतावनी सिस्टम जैसा कुछ बनता है या नहीं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
ISRO-ESA समझौता कब तक के लिए बढ़ाया गया है?
8 जनवरी 2032 तक। दस्तखत 10 सितंबर 2026 को पेरिस में International Space Summit के दौरान हुए, हालांकि मूल समझौता जनवरी 2002 से चला आ रहा है।
इस समझौते में नया क्या जुड़ा?
Human और robotic exploration, space weather और sustainable outer space activities जैसे तीन-चार नए क्षेत्र जुड़े हैं, बाकी Earth observation और navigation पहले से चल रहा सहयोग जारी रहेगा।
भारत को इससे क्या फायदा होगा?
Gaganyaan के लिए ग्राउंड ट्रैकिंग सपोर्ट पहले से तय है, Venus Orbiter Mission पर बातचीत चल रही है, और Earth observation डेटा की कैलिब्रेशन में मदद मिलती रहेगी।
क्या यह समझौता स्पेस डेब्रिस पर भी लागू होता है?
हां, sustainability of space activities इस नए दायरे में शामिल है, जिसमें बढ़ते स्पेस डेब्रिस और भीड़भाड़ वाली ऑर्बिट के सुरक्षित प्रबंधन जैसे मसले आते हैं।
यह समझौता खुद कोई नया मिशन नहीं है, बल्कि आने वाले सालों में बनने वाले मिशनों के लिए ढांचा है। असली तस्वीर तब साफ होगी जब Venus Orbiter या human spaceflight जैसे ठोस प्रोजेक्ट सामने आएंगे, फिलहाल यह सिर्फ रास्ता तैयार करने वाला कदम है।
स्रोत: ISRO, ESA, superkalam, GKToday