24 सितंबर 2014 को भारत पहली ही कोशिश में मंगल की ऑर्बिट तक पहुंच गया था। आज इसे ठीक 12 साल हो चुके हैं। तब सिर्फ एक सस्ता ऑर्बिटर मंगल का चक्कर लगा रहा था, अब ISRO की योजना उससे कहीं आगे की है: मंगल पर लैंडर, रोवर और हेलीकॉप्टर उतारने की।

24 सितंबर 2014: जब भारत पहली कोशिश में मंगल तक पहुंचा

Mars Orbiter Mission, जिसे Mangalyaan भी कहा गया, 5 नवंबर 2013 को PSLV-XL रॉकेट से श्रीहरिकोटा से लॉन्च हुआ था। करीब 300 दिन के सफर के बाद यह 24 सितंबर 2014 को मंगल की ऑर्बिट में पहुंचा। इसके साथ भारत रूस, अमेरिका और यूरोपीय स्पेस एजेंसी के बाद मंगल तक पहुंचने वाला चौथा नाम बना।

खास बात यह रही कि भारत पहली ही कोशिश में सफल हुआ, जो अमेरिका और रूस भी अपने पहले प्रयास में नहीं कर पाए थे। मंगल की सतह और अंदरूनी बनावट पर हुई हाल की स्टडी बताती है कि यह ग्रह अब भी वैज्ञानिकों के लिए कई सवाल छोड़ता है।

Mangalyaan इतना सस्ता क्यों था

इस पूरे मिशन पर करीब 450 करोड़ रुपये (तब के हिसाब से लगभग 74 करोड़ डॉलर) खर्च हुए। इसी दौरान मंगल पर पहुंचने वाले NASA के MAVEN मिशन पर करीब 671 करोड़ डॉलर खर्च हुए यानी दस गुना ज्यादा।

ISRO ने Chandrayaan-1 से बचे डिजाइन और पुर्जे दोबारा इस्तेमाल किए, और स्पेसक्राफ्ट का वजन सिर्फ करीब 15 किलोग्राम के पेलोड तक सीमित रखा। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि हॉलीवुड फिल्म Gravity का बजट भी इस मिशन से ज्यादा था।

पूरा स्पेसक्राफ्ट बनाने, टेस्ट करने और लॉन्च के लिए तैयार करने में सिर्फ करीब 15 महीने लगे, जो किसी भी अंतरग्रहीय मिशन के लिए बहुत कम समय माना जाता है। इससे भी लागत घटाने में मदद मिली।

हमारा हिसाब: 450 करोड़ रुपये को भारत की तब की करीब 128 करोड़ आबादी से बांटें, तो हर व्यक्ति पर सिर्फ साढ़े तीन रुपये का खर्च आया, यानी एक कप चाय से भी कम।

2022 में मिशन कैसे खत्म हुआ

Mangalyaan का डिजाइन जीवन सिर्फ 6 महीने का था, लेकिन यह करीब साढ़े सात साल तक काम करता रहा। Wikipedia पर दर्ज मिशन रिकॉर्ड के अनुसार 2022 में स्पेसक्राफ्ट का ईंधन खत्म हो गया, जिसके कारण यह अपने सोलर पैनल को सूरज की तरफ ठीक से मोड़ नहीं पाया और आखिरकार इससे संपर्क टूट गया।

ISRO ने इसे नॉन-रिकवरेबल घोषित किया और मिशन को औपचारिक रूप से बंद कर दिया। इसके बावजूद यह अब तक का सबसे कामयाब और सबसे सस्ता इंटरप्लैनेटरी मिशन बना रहा।

Mangalyaan तब बनाम Mangalyaan-2 अब

पहला Mangalyaan सिर्फ एक ऑर्बिटर था, यानी वह मंगल का चक्कर लगाता रहा और कभी उसकी सतह पर नहीं उतरा। ISRO का अगला मंगल मिशन, जिसे आधिकारिक तौर पर Mars Lander Mission और अनौपचारिक रूप से Mangalyaan-2 कहा जाता है, इससे बहुत आगे की योजना है।

बिंदुMangalyaan (2013-2022)Mars Lander Mission (योजना)
मिशन प्रकारसिर्फ ऑर्बिटरऑर्बिटर + लैंडर + रोवर + हेलीकॉप्टर
लॉन्च रॉकेटPSLV-XLLVM3
बजट का दर्जाकरीब 450 करोड़ रुपये, खर्च हो चुकाअभी सार्वजनिक नहीं, योजना चरण में

Mars Lander Mission में क्या नया होगा

ISRO प्रमुख डॉ. वी. नारायणन के हवाले से आई रिपोर्टों के अनुसार यह मिशन अमेरिका और चीन के बाद भारत को मंगल पर उतरने वाला तीसरा देश बना सकता है। इसमें कई नई तकनीकें शामिल होंगी।

  • NASA के Perseverance जैसा एक स्काई क्रेन सिस्टम, जो रोवर को धीरे से सतह पर उतारेगा
  • तेज रफ्तार कम करने के लिए एक सुपरसोनिक पैराशूट और हीट-प्रोटेक्टिव एयरोशेल
  • मंगल के पतले वायुमंडल में उड़ने वाला एक छोटा हेलीकॉप्टर
  • Aerobraking तकनीक, जिसमें मंगल के वायुमंडल के घर्षण से स्पेसक्राफ्ट की रफ्तार धीरे-धीरे कम की जाएगी

अलग-अलग समय पर आई रिपोर्टों में लॉन्च का साल अलग-अलग बताया गया है, कुछ में 2026 के आसपास तो कुछ ताज़ा जानकारी में 2030 के करीब। ISRO ने अभी तक कोई पक्की तारीख officially नहीं बताई है। स्पेसक्राफ्ट को पहले पृथ्वी की एक तय ऑर्बिट में भेजा जाएगा, और वहां से यह मंगल की तरफ अपना असली सफर शुरू करेगा।

हम भारतीयों के लिए क्या बदलेगा

हमारा आकलन है कि Mangalyaan की सबसे बड़ी उपलब्धि सिर्फ मंगल तक पहुंचना नहीं, बल्कि यह भरोसा था कि भारत कम बजट में भी बड़े इंटरप्लैनेटरी मिशन चला सकता है। यही भरोसा अब Bharatiya Antariksh Station जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स की नींव बन रहा है।

अगर Mars Lander Mission सफल होता है, तो भारत लैंडिंग तकनीक में भी अमेरिका और चीन की बराबरी करने वाले देशों में शामिल हो जाएगा, जो सिर्फ ऑर्बिटर भेजने से कहीं बड़ी बात है।

अभी क्या पता नहीं है और आगे क्या देखना है

Mars Lander Mission की पक्की लॉन्च तारीख, कुल बजट और स्काई क्रेन जैसी नई तकनीकों की टेस्टिंग स्थिति अभी सार्वजनिक नहीं है। हेलीकॉप्टर और सुपरसोनिक पैराशूट जैसे पुर्जे अभी डेवलपमेंट में बताए जाते हैं, इनकी अंतिम डिजाइन तय होना बाकी है।

आगे तीन बातों पर नजर रखनी होगी: ISRO की तरफ से Mars Lander Mission की officially पक्की लॉन्च विंडो, इसके लिए LVM3 के जरूरी अपग्रेड, और NASA के Artemis Programme में भारत की भूमिका से मिलने वाले लैंडिंग अनुभव का असर।

Mangalyaan की कहानी 12 साल पहले एक चौंकाने वाले पल के साथ शुरू हुई थी। अब सवाल यह नहीं कि भारत मंगल तक पहुंच सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि वह वहां उतर कब पाएगा।

Mangalyaan अभी कहां है?

Mangalyaan अब काम नहीं कर रहा। 2022 में ईंधन खत्म होने के बाद इससे संपर्क टूट गया था और ISRO ने इसे नॉन-रिकवरेबल घोषित कर दिया। इसका ढांचा अब भी मंगल की ऑर्बिट में मौजूद है।

Mangalyaan-2 कब लॉन्च होगा?

अभी कोई officially पक्की तारीख नहीं है। अलग-अलग समय पर आई रिपोर्टों में यह अनुमान 2026 से 2030 के बीच बताया गया है, इसलिए फिलहाल इसे सिर्फ योजना चरण में मानना ठीक रहेगा।

Mars Lander Mission में लैंडर उतरना इतना मुश्किल क्यों है?

मंगल का वायुमंडल पृथ्वी से बहुत पतला है, इसलिए पैराशूट अकेले रफ्तार कम करने के लिए काफी नहीं होता। इसीलिए एयरोशेल, सुपरसोनिक पैराशूट और स्काई क्रेन जैसी कई परतों वाली तकनीक जरूरी होती है।

क्या भारत तीसरा देश बनेगा जो मंगल पर उतरा?

अगर Mars Lander Mission सफल होता है, तो हां। अभी तक सिर्फ अमेरिका और चीन ही मंगल की सतह पर स्पेसक्राफ्ट सफलतापूर्वक उतार पाए हैं।

स्रोत: Wikipedia, The Planetary Society, India Strategic, Anantam IAS, SpaceDaily