13 अप्रैल 2029 को एक क्रूज़ जहाज जितना बड़ा ऐस्टरॉयड धरती के इतने करीब से गुजरेगा कि यह कई मौसम सैटेलाइट से भी नजदीक होगा, सिर्फ 32,000 किलोमीटर की दूरी से। इस ऐतिहासिक पल को करीब से देखने के लिए बन रहे यूरोप-जापान के साझा मिशन Ramses ने अभी अपना पहला बड़ा कदम पूरा किया है, और भारत भी इस मौके में हिस्सा लेने की कोशिश में है।

क्या है Apophis और 13 अप्रैल 2029 को क्या होगा

99942 Apophis नाम का यह ऐस्टरॉयड 2004 में खोजा गया था, और शुरुआत में वैज्ञानिकों ने इसके धरती से टकराने की करीब 2.7 प्रतिशत आशंका जताई थी। बाद की गणनाओं ने यह खतरा पूरी तरह खारिज कर दिया, लेकिन 2029 का इसका करीबी फ्लाईबाई अब भी खगोल विज्ञान के लिए एक दुर्लभ मौका है।

दूरी का पैमानाधरती से दूरी
Apophis का फ्लाईबाई (2029)करीब 32,000 किमी
जियोस्टेशनरी सैटेलाइट कक्षाकरीब 36,000 किमी
चांद की दूरीकरीब 3,84,000 किमी

यानी Apophis कई संचार सैटेलाइट से भी धरती के ज्यादा करीब से गुजरेगा, भले ही यह धरती से टकराएगा नहीं। NASA ने पहले ही साफ कर दिया है कि इस फ्लाईबाई से धरती को कोई खतरा नहीं है।

फिर भी वैज्ञानिकों के लिए यह एक बेहद दुर्लभ मौका है, क्योंकि इतने बड़े ऐस्टरॉयड का इतनी नजदीक से गुजरना सदियों में एक बार होता है। इसी वजह से दुनिया भर की स्पेस एजेंसियां इस पल को ज्यादा से ज्यादा डेटा के साथ दर्ज करना चाहती हैं।

Ramses मिशन ने अभी क्या हासिल किया

23 सितंबर 2026 को ESA और JAXA के साझा मिशन Ramses, यानी Rapid Apophis Mission for Space Safety, का मुख्य Core Module पहली बार पूरी तरह चालू किया गया। यह काम इटली के मिलान में OHB Italia की क्लीनरूम में हुआ।

Ramses के लीड इंजीनियर इंगो गर्थ के अनुसार यह पहली बार था जब स्पेसक्राफ्ट के ऑनबोर्ड कंप्यूटर को उसके बाकी जुड़े हुए सिस्टम के साथ एक साथ पावर दी गई। इससे पहले हर हिस्से की अलग-अलग जांच हो चुकी थी।

इस कंप्यूटर के साथ डेटा स्टोरेज वाली Mass Memory Unit, बिजली बांटने वाली Power Conditioning and Distribution Unit, और उपकरणों के आउटपुट को डिजिटल डेटा में बदलने वाली कई Remote Terminal Units भी जुड़ी हुई हैं। OHB Italia के प्रोजेक्ट मैनेजर ज्युसेप्पे फिलोमेनो के अनुसार यह पहला ठोस सबूत है कि पूरा सिस्टम योजना के मुताबिक एक साथ काम कर पा रहा है।

Ramses इतनी जल्दबाजी में क्यों बन रहा है

Ramses को 2028 में लॉन्च होना है और मार्च 2029 तक Apophis तक पहुंचना है, ताकि यह उसके करीबी फ्लाईबाई से पहले और उसके दौरान, दोनों वक्त डेटा जुटा सके। इतने कम समय में स्पेसक्राफ्ट तैयार करने के लिए टीम ने इसे दो हिस्सों में बांटा है, Core Module और Propulsion Module, जिन पर एक साथ काम चल रहा है।

  • फरवरी 2026: Critical Design Review पूरा हुआ
  • मई 2026: ESA-JAXA के बीच सहयोग समझौता हुआ
  • सितंबर 2026: Core Module का पहला पूरा स्विच-ऑन
  • अगले वसंत (2027): दोनों मॉड्यूल ESTEC सेंटर, नीदरलैंड्स में जुड़ेंगे
  • 2028: योजित लॉन्च
  • मार्च 2029 तक: Apophis के पास पहुंचना

भारत भी इस मौके को क्यों अहम मानता है

ISRO के अध्यक्ष एस सोमनाथ ने 2024 में बेंगलुरु में हुई एक Asteroid Day कार्यशाला में कहा था कि Apophis जैसा मौका बार-बार नहीं आता, और भारत को किसी न किसी तरह इस वैश्विक मिशन का हिस्सा बनना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि भारत NASA, ESA या JAXA के साझा Apophis मिशन में कोई उपकरण लगाकर योगदान दे सकता है।

ISRO का Telemetry, Tracking and Command Centre यानी ISTRAC पहले से ही धरती के पास से गुजरने वाली वस्तुओं यानी Near-Earth Objects को अपने ग्राउंड ऑब्जर्वेटरी नेटवर्क से ट्रैक करता है, हालांकि भारत के पास अभी अपना कोई समर्पित प्लैनेटरी डिफेंस मिशन नहीं है। ISTRAC के सहायक निदेशक अनिल कुमार के अनुसार 2004 में भी भारतीय ऑब्जर्वेटरी ने ही करीब 340 मीटर के एक ऑब्जेक्ट को धरती के करीब आते देखा था।

ISRO के पास अभी क्या है और आगे क्या हो सकता है

हमें लगता है कि Ramses जैसे मिशनों की तेज रफ्तार तैयारी भारत के लिए एक नजीर की तरह काम कर सकती है, क्योंकि ISRO ने भी चंद्रयान और मंगलयान जैसे मिशनों में बेहद कम समय और सीमित बजट में मुश्किल इंजीनियरिंग दिखाई है।

अगर आने वाले सालों में भारत Apophis मिशन में किसी उपकरण या सहयोग के जरिए शामिल होता है, तो यह ISRO के लिए अपनी प्लैनेटरी डिफेंस क्षमता को असली मिशन पर परखने का पहला बड़ा मौका होगा। सोमनाथ ने खुद उदाहरण के तौर पर NASA के DART मिशन का हवाला दिया था, जिसने एक ऐस्टरॉयड की दिशा बदलकर दिखाया कि इंसान चाहें तो किसी खतरे को टाल भी सकते हैं।

अभी क्या पता नहीं है और आगे क्या देखना है

अभी तक यह साफ नहीं है कि भारत Ramses या किसी और Apophis मिशन में किस रूप में शामिल होगा, क्योंकि सोमनाथ के बयान के बाद भी इसकी कोई ठोस योजना सार्वजनिक नहीं हुई है। Ramses के दोनों मॉड्यूल अभी अलग-अलग तैयार हो रहे हैं, और इनका जुड़ना भी अगले साल ही होगा।

आगे तीन बातों पर नजर रहेगी: 2027 में दोनों मॉड्यूल का सफल जुड़ाव, 2028 की लॉन्च तारीख पर अमल, और भारत की तरफ से Apophis मिशन में शामिल होने की कोई ठोस घोषणा।

Apophis धरती से नहीं टकराएगा, लेकिन इसकी नजदीकी झलक इंसानों को अपनी तैयारी परखने का एक दुर्लभ मौका दे रही है, और भारत भी इस मौके को यूं ही जाने नहीं देना चाहता।

स्रोत: ESA, Universe Today, Deccan Herald, The Week, Wikipedia

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