क्या आर्कटिक की बर्फ अब पिघलना बंद कर रही है? जवाब है नहीं, पर कहानी उलझी हुई है। NASA की एक नई स्टडी बताती है कि आर्कटिक सागर में बर्फ पिघलने का मौसम 1979 के मुकाबले अब करीब 40 दिन लंबा है। हैरानी की बात यह है कि यह बढ़ोतरी लगभग पूरी तरह 2010 से पहले हो गई थी, और उसके बाद से औसत मौसम तकरीबन वैसा ही बना हुआ है।

1979 के मुकाबले आज कितना अलग है आर्कटिक का मौसम?

NASA के नेतृत्व में हुई इस स्टडी में Communications Earth & Environment जर्नल में छपे शोध (Boisvert और सहयोगी, 2026) के हवाले से 1979 से 2023 तक के सैटेलाइट डेटा को खंगाला गया। टीम ने हर साल यह देखा कि बर्फ बसंत में पिघलना कब शुरू करती है और पतझड़ में फिर से जमना कब शुरू होता है, माइक्रोवेव सैटेलाइट सेंसर के तापमान डेटा की मदद से।

NASA के मुताबिक आर्कटिक का पिघलने वाला मौसम अब 1979 से करीब 40 दिन लंबा हो चुका है। स्टडी बताती है कि इसमें बड़ा हिस्सा देर से जमने का है, करीब 34 दिन, जबकि जल्दी पिघलना शुरू होने का हिस्सा सिर्फ करीब 7 दिन का है। यानी बर्फ ज़्यादा जल्दी नहीं पिघलती, बल्कि ज़्यादा देर तक पिघली रहती है।

2000 का दशक बनाम 2010 के बाद: तुलना टेबल में

NASA के अनुसार ज़्यादातर बढ़ोतरी 2010 से पहले हुई, खासकर 2000 के दशक में। उसके बाद से औसत मौसम की लंबाई करीब-करीब स्थिर बनी हुई है, भले ही हर साल का आंकड़ा ऊपर-नीचे होता रहे।

अवधिबदलावमुख्य वजह
1979 से 2010 तककुल मिलाकर करीब 40 दिन ज़्यादा, कुछ इलाकों में सालाना 5 दिन तक तेज़ बढ़ोतरीबर्फ घटने से खुला गहरा समुद्र ज़्यादा सूरज सोखने लगा
2010 से 2023 तकऔसत मौसम करीब 108 दिन पर टिका, साल-दर-साल ±11 दिन तक हेरफेरबादलों में बदलाव से सूरज की रोशनी कम पहुंचना

यह हमारा हिसाब है, कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं: 1979 से 2010 तक की 40 दिन की बढ़ोतरी को 31 साल में बांटें तो औसत रफ्तार करीब 1.3 दिन प्रति साल बनती है। पर स्टडी कहती है कि सबसे तेज़ इलाकों में यह रफ्तार सालाना 5 दिन तक पहुंची, यानी औसत से करीब चार गुना तेज़। यही फर्क बताता है कि बदलाव हर जगह एक जैसा नहीं था।

यह ठहराव आया क्यों?

2000 के दशक में तेज़ी से बर्फ घटने की वजह से समुद्र का गहरा पानी खुला रहने लगा, जो बर्फ से ज़्यादा सूरज की रोशनी सोखता है। इससे जमना देर से शुरू हुआ और मौसम लंबा खिंचता गया।

NASA के मुताबिक 2010 के बाद बादलों के पैटर्न में बदलाव आया, जिससे आर्कटिक के कुछ हिस्सों में सूरज की रोशनी कम पहुंचने लगी। बादल कैसे बनते हैं और रंग क्यों बदलते हैं, इसे समझने के लिए बादलों का रंग वाला हिसाब मदद करता है, यहां भी वही सिद्धांत सूरज की रोशनी को रोकने में काम कर रहा है।

NASA गोडार्ड की समुद्री बर्फ वैज्ञानिक लिनेट बोइसवर्ट के अनुसार, पहले बहुत सी पुरानी, मोटी बर्फ हर गर्मी में नहीं पिघलती थी। अब बर्फ पतली और कम है, इसलिए साल-दर-साल उतार-चढ़ाव ज़्यादा दिखने लगा है। उनका कहना है कि अब मौसम की लंबाई मौसमी हवाओं और बादलों पर ज़्यादा निर्भर करती है, ना कि सिर्फ लंबे समय के गर्म होने के ट्रेंड पर।

क्या 2026 के ताज़ा आंकड़े भी यही कहानी दिखाते हैं?

NASA और NSIDC के मुताबिक आर्कटिक की बर्फ ने 12 सितंबर 2026 को अपना सालाना सबसे कम विस्तार छुआ, करीब 46 लाख वर्ग किलोमीटर, जो 2008, 2010 और 2025 के बराबर सैटेलाइट रिकॉर्ड में दसवां सबसे कम है।

  • पिछले 20 साल (2007-2026) रिकॉर्ड के 20 सबसे कम न्यूनतम विस्तार वाले साल हैं
  • 2026 का न्यूनतम 2025, 2010 और 2008 जैसे ही स्तर पर टिका
  • NSIDC के वॉल्ट मायर के मुताबिक बर्फ का स्तर ठहर गया है, पर रिकॉर्ड के शुरुआती हिस्से से अब भी काफी कम है

यह आंकड़े ऊपर की स्टडी से मेल खाते हैं: लंबे समय का ट्रेंड अब भी नीचे की तरफ है, पर हाल के सालों में गिरावट की रफ्तार पहले जैसी तेज़ नहीं रही।

क्या यह ठहराव टिकाऊ है, या सिर्फ एक पड़ाव?

NASA के वैज्ञानिक खुद सतर्क हैं कि यह स्थिरता स्थायी हो, यह ज़रूरी नहीं। ग्रीनलैंड और कनाडाई आर्कटिक द्वीपसमूह के उत्तर में अब भी मोटी, पुरानी बर्फ बची है, जो हर मौसम में नहीं पिघलती।

अगर वहां की बर्फ भी पतली होने लगी, तो तेज़ी से बर्फ घटने का एक और दौर शुरू हो सकता है। यानी मौजूदा ठहराव कोई गारंटी नहीं, बल्कि एक नाज़ुक संतुलन है जो बादलों और बर्फ की मोटाई पर टिका है। दक्षिणी ध्रुव पर अंटार्कटिक की बर्फ में भी अगस्त 2026 में एक असामान्य गिरावट दर्ज हुई, जिसे वैज्ञानिक अभी सिर्फ मौसमी उतार-चढ़ाव मान रहे हैं, कोई लंबा ट्रेंड नहीं।

भारत के संदर्भ में यह क्यों मायने रखता है?

आर्कटिक दुनिया के बाकी हिस्सों के मुकाबले करीब चार गुना तेज़ी से गर्म हो रहा है, यह NASA खुद बताता है। यह गर्मी लंबे समय में 1.5°C की सीमा पार होने की बड़ी तस्वीर का हिस्सा है, जो अंततः समुद्र स्तर के ज़रिए भारत के तटीय इलाकों पर भी असर डाल सकती है।

आर्कटिक और भारत के मॉनसून के बीच सीधा रिश्ता अभी वैज्ञानिकों के बीच बहस का विषय है, इसे पक्का मानना जल्दबाज़ी होगी। भारत के अपने हिमालय के ग्लेशियर भी इसी तरह की बर्फ-मौसम गुत्थी से जूझ रहे हैं, बस पैमाना और असर का दायरा अलग है।

आगे क्या देखें?

ग्रीनलैंड और कनाडाई आर्कटिक द्वीपसमूह के उत्तर की मोटी बर्फ पर नज़र रखना अहम रहेगा, यही वह जगह है जहां अगला बड़ा बदलाव शुरू हो सकता है।

दक्षिणी ध्रुव पर अंटार्कटिक की बर्फ अपने सालाना सबसे बड़े विस्तार के करीब है। NASA और NSIDC मौसम पूरी तरह थमने के बाद इस साल का आधिकारिक आंकड़ा जारी करेंगे, जिससे यह साफ होगा कि अगस्त की गिरावट सच में एक अपवाद थी या नहीं।

आर्कटिक की बर्फ का यह ठहराव राहत की खबर जैसा लग सकता है, पर वैज्ञानिकों का कहना है कि यह ठंडी हो रही धरती का संकेत नहीं है। अगले कुछ साल बताएंगे कि यह सिर्फ एक पड़ाव है या स्थायी बदलाव।

स्रोत: NASA Earth Observatory, NASA/NSIDC, Communications Earth & Environment, ScienceDaily

यह भी पढ़ें