सोडियम-आयन बैटरी बनाने वाले अमेरिकी स्टार्टअप Peak Energy के दो समझौते ही 6.25 GWh के हैं (Peak के अनुसार)। IESA के मुताबिक भारत की लिथियम-आयन सेल क्षमता अभी करीब 2 GWh है। Peak के $108 मिलियन के दौर की अगुवाई GM ने की, ऐसा Bloomberg के हवाले से CBT News ने लिखा। दोनों आंकड़े बराबर नहीं, पर भारत के लिए मायने रखते हैं।
दुनिया में क्या हुआ: $108 मिलियन और दो बड़े समझौते
CBT News ने 22 अक्टूबर 2026 को Bloomberg की रिपोर्ट के हवाले से लिखा कि General Motors (GM) ने Peak Energy के $108 मिलियन के फंडिंग दौर की अगुवाई की। यह रिपोर्ट बुधवार, 21 अक्टूबर को आई।
CBT News के अनुसार Peak के पास करीब $1.1 अरब के ऑर्डर हैं। इनमें ज़्यादातर Jupiter Power के साथ 4.75 GWh और Energy Vault के साथ 1.5 GWh के समझौतों से आते हैं। CEO Landon Mossburg ने कहा कि कंपनी की पहली व्यावसायिक फैक्ट्री पहली तिमाही में पूरी होनी है।
GM का यह पहला कदम नहीं है। जून 2026 में GM Ventures ने Peak में रणनीतिक निवेश और साझा विकास का ऐलान किया था। Axios के अनुसार निशाना ग्रिड-स्तर की स्टोरेज है, कारें नहीं। SMM ने उद्योग-सूत्रों के हवाले से तैनाती 2029 के बाद की बताई है।
सोडियम-आयन: सस्ता रास्ता या अभी महंगा प्रयोग?
CBT News के अनुसार सोडियम-आयन सेल अभी परिपक्व नहीं हैं और लिथियम-आयन से महंगे पड़ते हैं। दोनों किस्मों की ज़्यादातर मैन्युफैक्चरिंग एशिया में है। Peak के निवेशक Greg Reichow (Eclipse Capital) का कहना है कि सोडियम-आयन घरेलू उत्पादन का आसान और सस्ता रास्ता देता है। यह दावा एक निवेशक का है, इसलिए इसे आंकड़ा नहीं, नज़रिया समझना ठीक रहेगा।
InsideEVs के अनुसार GM कहता है कि सोडियम-आयन सेल ज़्यादा तापमान-दायरे में चलते हैं और उनकी साइकिल-लाइफ लंबी है। उसी रिपोर्ट में लिखा है कि चीन के निर्माता इसे पहले ही बाज़ार में उतार चुके हैं, जबकि GM के अपने सेल पूर्ण उत्पादन से कुछ साल दूर हैं। यानी तकनीक बाज़ार में है, पर GM-Peak की जोड़ी अभी प्रोटोटाइप और शुरुआती फैक्ट्री के दौर में है।
कारों की बैटरी में नई रसायन-दिशा अलग है; उसके लिए सॉलिड-स्टेट बैटरी की कहानी पहले लिखी जा चुकी है। सोडियम-आयन का दांव ग्रिड और बैकअप पर है।
भारत का पैमाना: तीन आंकड़े, एक बड़ा अंतर
IESA और Customized Energy Solutions की रिपोर्ट (IBEF के ज़रिये, जुलाई 2026) के अनुसार भारत की ऊर्जा-भंडारण (ESS) ज़रूरत अभी के करीब 1 GWh से बढ़कर 2035-36 तक 888 GWh हो सकती है। 2026 की पहली छमाही में 47 GWh के टेंडर निकले और कुल टेंडर-पाइपलाइन 260 GWh हो गई।
| पैमाना | अभी | आगे |
|---|---|---|
| भारत में स्टोरेज की ज़रूरत (ESS) | करीब 1 GWh | 888 GWh (2035-36) |
| लिथियम-आयन सेल निर्माण क्षमता | करीब 2 GWh | करीब 110 GWh (2030 की योजना) |
| सालाना जुड़ने वाली BESS क्षमता | 507 MWh (2025) | करीब 5 GWh (2026, IESA अनुमान) |
यह हमारा आकलन है: Peak के 6.25 GWh के दो समझौते भारत की मौजूदा सेल-क्षमता के तिगुने से ज़्यादा हैं (6.25 ÷ 2 ≈ 3.1) और IESA के 2026 के अनुमान (करीब 5 GWh) से भी बड़े। तुलना सेब और संतरे की है, क्योंकि Peak के आंकड़े समझौते हैं और भारत के आंकड़े क्षमता व स्थापना। फिर भी पैमाने का अंदाज़ा इससे मिलता है।
भारत के लिए मतलब: आयात, नीति और वक़्त
IESA के अध्यक्ष Debmalya Sen के अनुसार भारत लिथियम-आयन सेल निर्माण में देर से उतरा और स्टोरेज की मांग के लिए आयात पर काफ़ी निर्भर रहा। उनके मुताबिक लिथियम-आयन अगले दशक के मध्य तक हावी रहेगा, और असली सवाल यह है कि अलग-अलग इस्तेमाल में दोनों रसायन साथ कैसे चलेंगे।
नीति इसी दिशा में है। Economic Times की रिपोर्ट के अनुसार VGF की दूसरी किस्त ₹5,400 करोड़ की है, जो 30 GWh की स्टैंडअलोन BESS को सहारा देती है, और इसमें 20% घरेलू मूल्य-संवर्धन ज़रूरी है। SMM के अनुसार भारी उद्योग मंत्रालय ने ग्रिड-स्टोरेज के लिए 10 GWh ACC क्षमता का वैश्विक टेंडर निकाला; दस्तावेज़ 15 जुलाई 2026 को आए और बोलियां 13 अक्टूबर 2026 को बंद हुईं।
स्टोरेज की ज़रूरत का एक सीधा नतीजा सौर बिजली के बर्बाद होने की समस्या में दिखता है, जिसका हल भंडारण से जुड़ा है। राय के तौर पर: सोडियम-आयन भारत में तभी मायने रखेगा जब उसकी कीमत लिथियम-फेरो-फॉस्फेट (LFP) के आसपास आए।
देश में सोडियम-आयन पर कौन काम कर रहा है
Reliance की सहायक कंपनी ने ब्रिटेन की Faradion को £100 मिलियन (करीब ₹1,003 करोड़) में खरीदने का समझौता किया था, ऐसा Bloomberg Quint ने एक्सचेंज फाइलिंग के हवाले से लिखा। कंपनी की योजना इस तकनीक को जामनगर के ऊर्जा-परिसर की स्टोरेज गीगाफैक्ट्री में इस्तेमाल करने की थी।
पुणे की Rechargion Energy का विवरण NITI Aayog के Frontier Tech Hub पर 23 जुलाई 2026 को अपडेट हुआ। उसके अनुसार कंपनी EV, सोलर और ग्रिड स्टोरेज के लिए नियामक-परीक्षित सेल बना चुकी है। उसी पन्ने पर लिखा है कि कम ऊर्जा-घनत्व के कारण सोडियम-आयन यात्री-कारों के बजाय स्टोरेज, दोपहिया-तिपहिया और डेटा-सेंटर बैकअप के ज़्यादा काम का है। ये कंपनी के दावे हैं।
जो अभी पता नहीं
- Peak के सेल की प्रति-kWh लागत, LFP (लिथियम-फेरो-फॉस्फेट) के मुक़ाबले।
- $108 मिलियन के दौर में GM और बाकी निवेशकों का अलग-अलग हिस्सा।
- Peak की पहली फैक्ट्री की सालाना क्षमता, और ‘पहली तिमाही’ किस साल की है।
- जामनगर में Faradion तकनीक से सेल का व्यावसायिक उत्पादन शुरू हुआ या नहीं।
- खुले मैदान में सोडियम-आयन ग्रिड-बैटरी की असली उम्र, यानी कितनी साइकिल के बाद क्षमता कितनी बचती है।
इन सवालों के जवाब अभी सार्वजनिक रिपोर्टों में नहीं हैं। इसलिए $108 मिलियन के दौर को फंडिंग की ख़बर की तरह पढ़ना ठीक है, बाज़ार में सफलता की गारंटी की तरह नहीं। पायलट से व्यावसायिक पैमाने तक पहुंचना एक अलग इम्तिहान है, और उसमें लागत सबसे कड़ी कसौटी रहेगी।
आगे क्या देखें
- भारी उद्योग मंत्रालय के 10 GWh ग्रिड-स्टोरेज ACC टेंडर के नतीजे, क्योंकि बोलियां 13 अक्टूबर 2026 को बंद हो चुकी हैं।
- Peak की पहली व्यावसायिक फैक्ट्री का चालू होना।
- GM के मिशिगन लैब में इस साल बनने वाले सोडियम-आयन प्रोटोटाइप सेल, जैसा CBT News ने लिखा।
एक अमेरिकी स्टार्टअप के दो सौदे भारत की सेल-क्षमता से बड़े निकले, यह अंतर आज की ख़बर का असली सबक है। सोडियम-आयन कब भारत के ग्रिड में दिखेगा, यह इस पर टिका है कि टेंडर, लागत और फैक्ट्रियां एक ही रफ़्तार से आगे बढ़ें।
स्रोत: Bloomberg (CBT News के ज़रिये), IESA-CES रिपोर्ट (IBEF के ज़रिये), Axios, SMM, InsideEVs, NITI Aayog Frontier Tech Hub