लोग पूछते हैं: क्या बिना केबल, सिर्फ़ हवा से, ऐसी गुप्त चाबी भेजी जा सकती है जिसे कोई चुपके से पढ़े तो पकड़ में आ जाए? Free-Space QKD (क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन) का जवाब हां है। 27-28 सितंबर 2026 की रात भारत में इसे 5.56 km पर आज़माया गया, और Raksha Anirveda के अनुसार चाबी 230 से 260 bps की दर से बनी।
पहले क्या हो चुका था: फाइबर से हवा तक
रक्षा मंत्रालय के बयान के अनुसार DRDO और IIT दिल्ली की टीम ने 2024 में 100 km लंबी टेलीकॉम फाइबर स्पूल पर entanglement वाली क्वांटम चाबी बांटी थी। उसी टीम ने जून 2025 में IIT दिल्ली कैंपस के भीतर 1 km से ज़्यादा के free-space लिंक पर चाबी बनाकर दिखाई।
QNu Labs की प्रेस रिलीज़ इसे भारत का पहला free-space QKD लिंक कहती है, पर 5 km के स्तर पर। यानी दावा दूरी के पैमाने का है, free-space तकनीक के पहले प्रयोग का नहीं। दोनों ट्रायल की बुनियादी बातें एक नज़र में:
| पैमाना | DRDO-IIT दिल्ली (जून 2025) | QNu-BISAG-N-IIT गांधीनगर (सितंबर 2026) |
|---|---|---|
| दूरी | 1 km से ज़्यादा | 5.56 km |
| जगह | IIT दिल्ली कैंपस | BISAG-N से IIT गांधीनगर |
| सुरक्षित चाबी की दर | लगभग 240 bps | 230-260 bps |
| क्वांटम बिट त्रुटि दर (QBER) | 7% से कम | 5% से कम |
| तरीका | Entanglement-आधारित QKD | Armos हार्डवेयर QKD + PQC सॉफ्टवेयर परत |
दोनों सिस्टम अलग हैं, इसलिए यह सीधी रेस नहीं है। फिर भी दिशा साफ़ दिखती है: दूरी करीब पांच गुना हुई, चाबी की दर लगभग उतनी ही रही और रिपोर्ट की गई त्रुटि दर कम है।
इस बार नया क्या जुड़ा
Free-space में फोटॉन (प्रकाश के कण) फाइबर की जगह हवा से गुज़रते हैं। इसमें सबसे कठिन काम है दोनों छोरों पर बीम को सही जगह टिकाए रखना। QNu Labs के अनुसार उसका Pointing, Acquisition and Tracking (PAT) सिस्टम यही करता है और उसने 1550 nm का क्वांटम चैनल बनाए रखा।
1550 nm वही तरंगदैर्ध्य-क्षेत्र है जिसमें आम टेलीकॉम फाइबर भी चलते हैं, इसलिए इस पर बने उपकरण और डिटेक्टर आगे फाइबर नेटवर्क से जोड़ना आसान बना सकते हैं। यह जुड़ाव हमारी समझ है, ट्रायल का घोषित नतीजा नहीं, और इस पर रिलीज़ में कुछ नहीं कहा गया।
दूसरी नई बात है सॉफ्टवेयर से जुड़ाव। BISAG-N का Vedic Kavach प्लेटफॉर्म पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी (PQC) और क्वांटम रैंडम नंबर जनरेशन (QRNG) देता है। Quantum Computing Report के अनुसार ETSI GS QKD 014 इंटरफ़ेस से 256-बिट चाबियां पहुंचाई गईं और एक टेस्ट संदेश एन्क्रिप्ट व डिक्रिप्ट हुआ।
230-260 bps को रोज़ की भाषा में पढ़ें
bps का मतलब है हर सेकंड बनने वाले सुरक्षित बिट। 256-बिट की एक चाबी के लिए 256 बिट चाहिए, तो इस दर पर एक चाबी करीब 1 सेकंड में बन जाती है।
सीधा गणित: 230 से 260 bps पर एक घंटे में 8.28 लाख से 9.36 लाख बिट बनते हैं, यानी लगभग 3,200 से 3,650 चाबियां। यह तभी सही है जब दर घंटे भर लगातार बनी रहे, और ट्रायल की अवधि या निरंतरता के आंकड़े अभी सामने नहीं आए हैं।
मान लीजिए किसी लिंक की चाबी हर मिनट बदलती है, यानी घंटे में 60 चाबियां। तब कागज़ पर 50 से ज़्यादा ऐसे लिंक की चाबी इस दर से बन सकती है। असली नेटवर्क में ओवरहेड और रुकावटें यह संख्या घटाएंगी।
QKD अकेले काफी क्यों नहीं
QKD संदेश नहीं भेजता, वह चाबी बनाता है। क्वांटम अवस्था को मापने पर वह बदल जाती है, इसलिए बीच में कोई छुपकर देखे तो त्रुटि बढ़ती है और दोनों पक्ष वह चाबी फेंककर नई बना सकते हैं।
Raksha Anirveda की रिपोर्ट के अनुसार QKD को खास ऑप्टिकल उपकरण, प्रमाणित सामान्य संचार चैनल और लागू करने की खामियों से बचाव चाहिए। उधर बड़े क्वांटम कंप्यूटर बनाने की दौड़ कुछ मौजूदा सार्वजनिक-कुंजी प्रणालियों को कमज़ोर कर सकती है। इसलिए दो परतें साथ रखी गईं:
- हार्डवेयर परत (Armos QKD): चाबी बनाती है और छेड़छाड़ की भनक देती है।
- सॉफ्टवेयर परत (Vedic Kavach, PQC): मौजूदा डिजिटल नेटवर्क पर चलती है। BISAG-N और QNu Labs के अनुसार क्वांटम चैनल कुछ देर टूटे तो भी सुरक्षा बनी रहती है।
- QRNG: चाबी के लिए सही मायने में यादृच्छिक संख्याएं देता है।
भारत के लिए इसका मतलब
Raksha Anirveda के अनुसार National Quantum Mission 2023 में ₹6,003.65 करोड़ के बजट से मंज़ूर हुआ था। इसमें क्वांटम कंप्यूटिंग, संचार, सेंसिंग और सामग्री शामिल हैं। कंप्यूटिंग की तरफ अमरावती में बन रहा क्वांटम कंप्यूटर भी इसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा है।
मिशन का एक लक्ष्य 2,000 km तक दूर ज़मीनी स्टेशनों के बीच उपग्रह-आधारित सुरक्षित संचार है। 5.56 km से 2,000 km तक का फासला बहुत बड़ा है। QNu Labs के CEO Sunil Gupta के अनुसार यह ट्रायल लंबी दूरी के नेटवर्क और सैटेलाइट संचार की ओर एक कदम है।
Free-space वहां काम आ सकता है जहां फाइबर बिछाना महंगा या कठिन हो, जैसे पहाड़ी इलाके और सैन्य क्षेत्र। यह हमारा अंदाज़ा है कि शुरुआती उपयोग रक्षा और वित्त जैसे छोटे, ऊंची-सुरक्षा वाले लिंक तक रहेंगे। आम उपभोक्ता तक पहुंचने में लंबा समय लगेगा।
जो अभी पता नहीं
- ट्रायल एक रात का था। दिन की रोशनी, कोहरे या बारिश में प्रदर्शन के आंकड़े सामने नहीं आए हैं।
- लिंक कितने घंटे या दिन लगातार टिका, यह सार्वजनिक नहीं है।
- दूरी बढ़ने पर चाबी की दर कितनी गिरेगी, यानी 10 या 20 km पर क्या होगा, इसका कोई आंकड़ा नहीं है।
- PAT जैसे सिस्टम की लागत और बड़े पैमाने पर तैनाती का खर्च भी सामने नहीं है।
एक और बात: दोनों प्रयोगों के आंकड़े अलग-अलग संस्थाओं ने अलग सिस्टम और अलग हालात में बताए हैं। इसलिए 240 और 230-260 bps की सीधी बराबरी से यह नहीं निकाला जा सकता कि नया सिस्टम बेहतर है। इसके लिए एक ही कसौटी पर परीक्षण चाहिए, जो अभी उपलब्ध नहीं है।
वायुमंडल की turbulence, मौसम, सीधी दृष्टि-रेखा और सटीक संरेखण को Raksha Anirveda ने इस तकनीक की बड़ी इंजीनियरिंग चुनौतियां बताया है।
अगला पड़ाव
- कंपनी के अनुसार अगला लक्ष्य लंबी दूरी, कई नोड वाले नेटवर्क और सैटेलाइट-आधारित क्वांटम संचार है।
- खराब मौसम या दिन के समय के परीक्षण, अगर सार्वजनिक हों।
- PQC के साथ जुड़ा यह हाइब्रिड मॉडल किसी सरकारी या बैंकिंग नेटवर्क में आज़माया जाता है या नहीं।
5.56 km की वह रात एक नाप-तौल वाला इंजीनियरिंग नतीजा है, किसी चमत्कार का एलान नहीं। चाबी बनी, संदेश खुला, और एक परत डगमगाए तो दूसरी बची रहे, ऐसा ढांचा आज़माया गया। अब सवाल धूप, कोहरे और महीनों की निरंतरता का है।
स्रोत: QNu Labs (प्रेस रिलीज़), PIB/MeitY, Quantum Computing Report, Raksha Anirveda, रक्षा मंत्रालय/DRDO का बयान