चीन के वैज्ञानिकों ने एक चुंबक बनाने वाली बैक्टीरिया worms के अंदर डाली, और उन worms की औसत उम्र 43% तक बढ़ गई।

Chinese Academy of Sciences की Hefei Institutes of Physical Science टीम के अनुसार यह अध्ययन Free Radical Biology and Medicine जर्नल में छपा है, और अभी सिर्फ Caenorhabditis elegans नाम के छोटे worm पर हुआ है।

यह खोज हुई कैसे, और नतीजा क्या निकला?

टीम ने Magnetospirillum magneticum AMB-1 नाम की एक magnetotactic bacterium, यानी अपने अंदर छोटे-छोटे चुंबक जैसे कण बनाने वाली बैक्टीरिया, worms को खिलाई। Prof. An Xu की टीम के अनुसार इन worms की औसत उम्र 43.39% तक बढ़ी, और बुढ़ापे में भी उनका दिमाग और आंत बेहतर हालत में रहे।

Caenorhabditis elegans को ऐसी स्टडी के लिए इसलिए चुना जाता है क्योंकि इसकी सामान्य उम्र सिर्फ 2-3 हफ्ते होती है और इसके जीन इंसानों से मिलते-जुलते हैं, इसलिए यह उम्र बढ़ने से जुड़ी रिसर्च का एक मानक मॉडल जीव है।

Magnetosome असल में आयरन ऑक्साइड के बेहद छोटे क्रिस्टल होते हैं, जिन्हें यह बैक्टीरिया अपनी झिल्ली के अंदर बनाती है, ताकि वह धरती के चुंबकीय क्षेत्र की दिशा भांप सके। यही आयरन-आधारित बनावट इस स्टडी को ferroptosis से जोड़ती है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि असली वजह चुंबक खुद नहीं, बल्कि ferroptosis नाम की एक process का दबना है, यानी आयरन जमा होने और fat (lipid) के ऑक्सीकरण से होने वाली कोशिका मृत्यु। AMB-1 ने worms के अंदर आयरन जमाव और lipid peroxidation दोनों घटा दिए। ऐसी ही जीव-बैक्टीरिया साझेदारी की 50 करोड़ साल पुरानी मिसाल भी हाल ही में सामने आई थी।

  • औसत उम्र में बढ़ोतरी: 43.39%
  • असली बैक्टीरिया: Magnetospirillum magneticum AMB-1
  • असर का ज़रिया: ferroptosis का दबना, चुंबकत्व खुद नहीं
  • भूमिका निभाने वाले जीन: ftn-1, bli-3, ads-1

पहला भ्रम: चुंबक शरीर पर लगाने से सेहत को फायदा होता है

बाज़ार में magnetic bracelet और magnet therapy जैसी चीज़ें दशकों से "दर्द कम करने" और "सेहत सुधारने" के दावे के साथ बिकती रही हैं, हालांकि इनके पीछे ठोस वैज्ञानिक सबूत कभी नहीं मिला।

यह नई स्टडी उस दावे का समर्थन नहीं करती। यहां असर बाहर से लगाए गए चुंबक का नहीं, बल्कि शरीर के अंदर मौजूद एक खास बैक्टीरिया के जैविक असर (ferroptosis कम करना) का है, चुंबकीय गुण सिर्फ इस बैक्टीरिया की पहचान है, इलाज का ज़रिया नहीं।

दूसरा भ्रम: ज़्यादा आयरन हमेशा सेहत के लिए अच्छा होता है

आयरन को अक्सर सिर्फ खून की कमी (anemia) से जोड़कर देखा जाता है, इसलिए लगता है कि ज़्यादा आयरन हमेशा फायदेमंद है।

पर स्टडी के मुताबिक उम्र बढ़ने के साथ शरीर में आयरन जमा होना ferroptosis को बढ़ावा देता है, जो नुकसानदायक है। hemochromatosis जैसी बीमारियां पहले से दिखा चुकी हैं कि शरीर में ज़्यादा आयरन जमा होना अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए AMB-1 ने आयरन जमाव घटाकर ही worms की उम्र बढ़ाई, ज़्यादा आयरन देकर नहीं।

तीसरा भ्रम: यह खोज कल ही इंसानों पर लागू हो जाएगी

स्टडी के नतीजे प्रभावशाली हैं, पर यह पूरा प्रयोग सिर्फ Caenorhabditis elegans नाम के करीब 1 मिलीमीटर लंबे worm पर हुआ है, इंसानों पर नहीं। ठीक इसी तरह हाल में आए एक और CRISPR आधारित इलाज के ट्रायल में भी नतीजे सिर्फ शुरुआती चरण के हैं।

शोधकर्ताओं ने खुद साफ किया है कि यह सिर्फ एक शुरुआती मॉडल-स्टडी है, दवा नहीं। worm और इंसान के शरीर की जटिलता में बहुत फर्क है, इसलिए इंसानों में भी वैसा ही असर होगा, यह मान लेना जल्दबाज़ी होगी।

चौथा भ्रम: बुढ़ापा रोकने का मतलब सिर्फ Antioxidant Supplement लेना है

Anti-aging बाज़ार में आमतौर पर generic antioxidant supplements को ही समाधान बताया जाता है, मानो हर तरह की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया एक जैसी हो।

यह स्टडी दिखाती है कि उम्र बढ़ने के पीछे ferroptosis जैसा एक बहुत specific रास्ता भी है, जिसे सिर्फ सामान्य antioxidant से नहीं, बल्कि उसी रास्ते को सीधे लक्षित करने वाले तरीके से बेहतर रोका जा सकता है।

हमारा आकलन: अगर worms वाला 43% अनुपात सीधे इंसान की औसत उम्र (WHO के मुताबिक भारत में करीब 70 साल) पर लगाया जाए, तो यह करीब 30 साल ज़्यादा जीने के बराबर दिखेगा, हालांकि worm और इंसान की तुलना सीधी नहीं की जा सकती, इसलिए यह सिर्फ अनुपात समझने भर के लिए है।

भारत के संदर्भ में यह क्यों मायने रखता है?

भारत की आबादी तेज़ी से बूढ़ी हो रही है, संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक 2050 तक हर पांच में से करीब एक भारतीय बुज़ुर्ग होगा। ऐसे में aging biology और ferroptosis जैसी चीज़ों पर रिसर्च भारत के लिए भी अहम होता जा रहा है।

फिलहाल भारत में ferroptosis-केंद्रित aging research सीमित है, ज़्यादातर काम genetics और lifestyle वाले पहलुओं पर होता है। यह स्टडी दिखाती है कि microbiome और bacteria का रास्ता भी एक नई दिशा हो सकता है, जिसे भारतीय gerontology (वृद्धावस्था विज्ञान) संस्थान आगे खोज सकते हैं, खासकर तब जब सस्ते और बड़े पैमाने पर काम करने वाले उपायों की ज़रूरत है।

भारत में AIIMS दिल्ली और मद्रास मेडिकल कॉलेज, चेन्नई के National Centre for Ageing जैसे संस्थान पहले से बुज़ुर्गों की देखभाल और उम्र बढ़ने पर शोध करते हैं, पर वहां का ज़्यादातर काम genetics और lifestyle वाले पहलुओं पर केंद्रित है। यह स्टडी दिखाती है कि microbiome और bacteria का रास्ता भी एक नई दिशा हो सकता है, जिसे ऐसे संस्थान आगे खोज सकते हैं।

अभी क्या पता नहीं, और आगे क्या होगा?

अभी यह साफ नहीं है कि यही असर चूहों या इंसानों जैसे बड़े और जटिल शरीर में भी वैसा ही दिखेगा, और अगर बैक्टीरिया को सीधे शरीर में डाला जाए तो उसकी सुरक्षा कैसी रहेगी।

शोधकर्ताओं के अनुसार अगला कदम इसी तरह के प्रयोग बड़े जीवों में करना और यह समझना है कि क्या असर सच में सिर्फ ferroptosis कम होने से है, या बैक्टीरिया के चुंबकीय गुण की भी कोई परोक्ष भूमिका है। तब तक यह सिर्फ एक दिलचस्प शुरुआती संकेत है, तय जवाब नहीं।

एक छोटे worm में 43% ज़्यादा उम्र, इंसानी उम्र बढ़ाने की गारंटी नहीं है, पर यह ज़रूर दिखाता है कि बुढ़ापे को समझने के नए रास्ते अब भी खुल रहे हैं।

स्रोत: Hefei Institutes of Physical Science (CAS), Free Radical Biology and Medicine, ScienceDaily

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