BepiColombo को Mercury तक पहुंचने में 8 साल क्यों लगे? ESA के अनुसार वजह सूरज की भारी खिंचावट है: बुध की कक्षा में टिकने के लिए यान को इतना धीमा करना पड़ता है कि ऊर्जा का हिसाब प्लूटो भेजने से भी ज़्यादा बैठता है। ESA-JAXA का यह मिशन आज, 20 अक्टूबर 2026 को, प्रक्षेपण के 8 साल पूरे कर रहा है; कक्षा-प्रवेश की ESA योजना 21 नवंबर 2026 की है।
MESSENGER बनाम BepiColombo: एक ही ग्रह, दो अलग तरीके
Mercury की कक्षा तक अब तक सिर्फ़ NASA का MESSENGER पहुंचा है, और NASA के अनुसार वही कक्षा में जाने वाला पहला यान था। ESA के अनुसार BepiColombo पहला मिशन होगा जो Mercury के चारों ओर एक साथ दो यान घुमाएगा। BepiColombo की तारीखें योजना हैं, हो चुकी घटनाएं नहीं।
| पैमाना | MESSENGER (NASA) | BepiColombo (ESA + JAXA) |
|---|---|---|
| प्रक्षेपण | 3 अगस्त 2004 | 20 अक्टूबर 2018 (Ariane 5, Kourou) |
| कक्षा में प्रवेश | 18 मार्च 2011 (हो चुका) | 21 नवंबर 2026 (योजना) |
| प्रक्षेपण से कक्षा तक | लगभग 6.6 साल | लगभग 8.1 साल (योजना के अनुसार) |
| कक्षा में यान | 1 | 2 (MPO और Mio) |
| कक्षा (सतह से ऊंचाई) | शुरुआत में लगभग 200 × 15,200 km, चक्कर लगभग 12 घंटे का | MPO: 480 × 1,500 km (2.3 घंटे); Mio: 590 × 11,640 km (9.3 घंटे) |
| अंत / विज्ञान चरण | 30 अप्रैल 2015 को सतह से टकराया | विज्ञान चरण अप्रैल 2027 से (योजना) |
तारीखों के हिसाब से BepiColombo का सफर MESSENGER से करीब डेढ़ साल लंबा है। दोनों ने गुरुत्व-सहायता (gravity assist) से गति घटाई, पर BepiColombo के ion thrusters, ESA के अनुसार, अंतरिक्ष मिशनों में अब तक का सबसे बड़ा कुल impulse जमा करेंगे।
दो यान, दो काम: कक्षा का आकार क्यों मायने रखता है
MESSENGER की कक्षा बहुत लंबी अंडाकार थी: सतह के पास लगभग 200 km, दूसरे छोर पर लगभग 15,200 km। Planetary and Space Science के एक अध्ययन के अनुसार इसी वजह से उत्तरी गोलार्ध ज़्यादा बारीकी से नपा और दक्षिणी कम।
BepiColombo काम बांट देता है। ESA का MPO 480 × 1,500 km की कम अंडाकार कक्षा से सतह और भीतरी बनावट का नक्शा बनाएगा; Space Science Reviews के पेपर के अनुसार यह कक्षा ज़्यादा समान कवरेज देती है। JAXA का Mio 590 × 11,640 km की ऊंची कक्षा से चुंबकीय क्षेत्र और plasma नापेगा।
रोज़ की मिसाल से समझें तो यह मोहल्ले का नक्शा बनाने के लिए गली-गली घूमने और पूरे शहर का ट्रैफ़िक देखने के लिए छत पर चढ़ने जैसा बँटवारा है। MESSENGER के पास एक ही यान था, इसलिए दोनों काम उसकी एक ही लंबी राह से निकले। JAXA की अगली बड़ी योजनाओं में Japan का MMX मिशन भी है।
सूरज की खिंचावट: ब्रेक लगाना ही असली मुश्किल
ESA के अनुसार Mercury की ओर जाते यान को लगातार सूरज की खिंचावट के विरुद्ध ब्रेक लगाना पड़ता है। 3 सितंबर 2026 को Mercury Transfer Module (MTM) अलग हुआ, यानी जिस हिस्से ने 8 साल यात्रा चलाई उसे छोड़ दिया गया। अब MPO के अपने thrusters आगे की दिशा संभालते हैं।
24 सितंबर को MPO के axial thrusters 8 मिनट 42 सेकंड चले और यान को 11.4 m/s का धक्का मिला। ESA के अनुसार नवंबर की मुख्य प्रक्रिया से पहले ऐसे कई और छोटे सुधार-अवसर तय हैं।
सीधा गणित: अलगाव के समय यान पृथ्वी से 20 करोड़ km से ज़्यादा दूर था (ESA)। रेडियो संकेत 3 लाख km प्रति सेकंड की चाल से चलता है, तो एक तरफ़ का संदेश लगभग 11 मिनट में पहुंचता है। इसीलिए ऐसे क्षणों में ज़मीन से तुरंत हस्तक्षेप का मौका नहीं रहता।
15 सितंबर के 'first light' टेस्ट में क्या दिखा
MTM हटते ही MPO के उपकरणों के सामने का रास्ता खुला। ESA के अनुसार 15 सितंबर 2026 को सभी उपकरण MTM अलग होने के बाद पहली बार साथ चालू हुए और शुरुआती विश्लेषण में स्वस्थ दिखे।
- BELA (laser altimeter): 21.5 घंटे में 7 लाख से ज़्यादा laser pulse खुली अंतरिक्ष में दागे; ESA के अनुसार उपकरण 2016 के आखिरी पूरे ज़मीनी टेस्ट के बाद भी बढ़िया हालत में है।
- MERTIS (thermal imaging spectrometer): 22 घंटे के टेस्ट में लगभग 1 gigabit डेटा मिला; DLR के अनुसार 2013 की ज़मीनी calibration के मुक़ाबले संवेदनशीलता में लगभग कोई कमी नहीं।
- SIMBIO-SYS (कैमरा): तीनों optical channel चालू हुए और अंतरिक्ष में पहली तस्वीर ली गई (ESA)।
ये सब जांचें खाली अंतरिक्ष की ओर हुईं। DLR के अनुसार MERTIS अप्रैल 2027 से Mercury के दिन वाले हिस्से का लगभग 500 मीटर प्रति pixel के विवरण में नक्शा बनाएगा।
भारत के लिए मतलब: Mangalyaan से सीधी तुलना
यह भारत का मिशन नहीं है, पर कक्षा-प्रवेश की कठिनाई समझने के लिए हमारे पास अपना उदाहरण है। ISRO के बयान के अनुसार Mangalyaan की कक्षा-प्रवेश 24 सितंबर 2014 को 440 न्यूटन के Liquid Apogee Motor और आठ छोटे इंजनों से हुई, पहली ही कोशिश में। कक्षा 421.7 × 76,993.6 km की थी और एक चक्कर 72 घंटे 51 मिनट का।
उसी पैमाने पर BepiColombo का MPO हर 2.3 घंटे में एक चक्कर लगाएगा, यानी MOM से लगभग 32 गुना छोटा चक्कर। इसका मतलब है कि Mercury पर हर दिन कहीं ज़्यादा बार सतह के ऊपर से गुज़रना।
हमारा आकलन: ISRO का Aditya-L1 सौर गतिविधि का अध्ययन करता है, जबकि DLR के अनुसार BepiColombo सौर हवा से Mercury की अंतःक्रिया भी परखेगा। दोनों के प्रकाशित नतीजे एक ही सूरज की अलग-अलग जगह से खींची तस्वीरें होंगे, और भारतीय शोधकर्ताओं के लिए तुलना का मौका बनेंगे।
जो अभी पता नहीं
सबसे बड़ी अनिश्चितता 21 नवंबर की कक्षा-प्रवेश प्रक्रिया है। वह अभी हुई नहीं है, इसलिए उसका नतीजा आज किसी को नहीं पता। ESA की समयरेखा में अभी सिर्फ़ तारीख है; भारतीय समय (IST) में घंटा-मिनट तभी बताया जा सकेगा जब वह घोषित होगा।
तारीखों पर भी सावधानी चाहिए। ESA 21 नवंबर 2026, 9-10 दिसंबर 2026 और अप्रैल 2027 बताता है। कुछ तीसरे-पक्ष के कैलेंडर 30 नवंबर जैसी अलग तारीख दिखाते हैं, इसलिए ESA की तारीख को ही आधार मानें।
विज्ञान में भी सवाल खुले हैं: Mercury का भीतरी हिस्सा कैसा है और उसका विकास कैसे हुआ। DLR के अनुसार BELA सतह की ज्वारीय विकृति (tidal deformation) नापकर इन्हीं सवालों की बंदिशें कसेगा।
आगे क्या देखें
- 21 नवंबर 2026: Mercury की कक्षा में प्रवेश की योजना (ESA)।
- 9-10 दिसंबर 2026: MPO और Mio का एक-दूसरे से अलग होना (ESA)।
- अप्रैल 2027: मुख्य विज्ञान चरण की शुरुआत; ESA के अनुसार कक्षाओं की fine-tuning में लगभग तीन महीने लगते हैं।
- इस बीच: नवंबर से पहले MPO के और छोटे दिशा-सुधार तय हैं (ESA), यानी कक्षा-प्रवेश से पहले भी यान की दिशा परखी जाती रहेगी।
इन तीनों तारीखों में से सिर्फ़ पहली कक्षा-प्रवेश की है; बाक़ी दोनों उसी के सफल होने पर टिकी हैं। आज प्रक्षेपण के 8 साल पूरे हुए हैं और प्रवेश की योजना में 32 दिन बाकी हैं। MESSENGER ने 2011 में रास्ता दिखाया था; अब देखना है कि दो यानों वाली यह जोड़ी उसी ग्रह को कितनी नई नज़र से दिखाती है।
स्रोत: ESA, DLR, NASA, ISRO, JAXA, Space Science Reviews