भारतीय समय के हिसाब से 20 अक्टूबर की रात 1:11 बजे, जब ज़्यादातर घरों की बत्तियां बुझी होंगी, जापान के तानेगाशिमा स्पेस सेंटर से H3 रॉकेट उड़ान भरेगा। उसके ऊपर लगा MMX मिशन मंगल के चांद Phobos से कम से कम 10 ग्राम सैंपल लेकर 2031 में धरती पर लौटने की कोशिश करेगा।
यह लेख समय को भारतीय घड़ी में रखता है, और यह भी देखता है कि इस मिशन से भारत के अपने Mars और नमूना-वापसी इरादों को क्या सीख मिलती है। लॉन्च अभी हुआ नहीं है, यह तय कार्यक्रम है।
आज रात क्या होने वाला है, और कब?
Jiji Press की रिपोर्ट के मुताबिक JAXA ने H3 की 10वीं उड़ान के लिए 20 अक्टूबर 2026 को जापानी समय सुबह 4:41:03 बजे का समय तय किया है। जापान भारत से साढ़े तीन घंटे आगे है, इसलिए IST में यह रात 1:11 बजे बैठता है। ESA के अनुसार JAXA का YouTube चैनल जापानी और अंग्रेज़ी में इसे लाइव दिखाएगा।
Space.com के अनुसार JAXA ने मूल रूप से 2024 में उड़ान सोची थी, पर H3 रॉकेट की दिक्कतों के कारण उसे रुकना पड़ा। यानी आज की तारीख़ दो साल की देरी के बाद आई है।
| पड़ाव | तय समय |
|---|---|
| लॉन्च | 20 अक्टूबर 2026, 4:41 JST (1:11 IST) |
| मंगल की कक्षा में प्रवेश | अगस्त 2027 (ESA) |
| Phobos के पास की कक्षा | सितंबर 2027 (ESA) |
| IDEFIX रोवर की रिहाई | 2029 की शुरुआत (ESA) |
| धरती के लिए रवानगी | नवंबर 2030 (Space.com) |
| सैंपल कैप्सूल की लैंडिंग | 2031, ऑस्ट्रेलिया का Woomera इलाका |
Phobos और Deimos आख़िर आए कहां से?
ESA साफ़ कहता है कि मंगल के इन दोनों चांदों की जन्म-कहानी अभी किसी को पता नहीं। अब तक कोई यान इनके पास लंबे समय तक नहीं रुका, सिर्फ़ कुछ फ्लाईबाई हुए हैं। दो मुख्य कहानियां चल रही हैं, और दोनों के पास अपने सबूत हैं।
- पकड़े गए क्षुद्रग्रह: Space.com के अनुसार दोनों चांद छोटे, बेढंगे और D-type क्षुद्रग्रहों जैसे स्पेक्ट्रम वाले हैं। ऐसे पिंड सौरमंडल के 4.6 अरब साल पुराने माल को संभाले रखते हैं।
- विशाल टक्कर का मलबा: इनकी कक्षाएं लगभग गोल हैं और मंगल की भूमध्य रेखा की सीध में हैं। पकड़ा गया पिंड आमतौर पर लंबी, तिरछी कक्षा में फंसता, इसलिए यह दूसरी कहानी मज़बूत लगती है।
फ़ैसला कैसे होगा? NASA का MEGANE उपकरण गामा-किरणों और न्यूट्रॉन से Phobos की सतह के नीचे दसियों सेंटीमीटर तक के तत्व मापेगा। Space.com के अनुसार हाइड्रोजन, क्लोरीन, सोडियम और पोटैशियम ज़्यादा मिले तो पकड़े गए क्षुद्रग्रह की कहानी को बल मिलेगा। कम मिले तो टक्कर की गर्मी का इशारा होगा।
10 ग्राम सैंपल कैसे लिया जाएगा, और इतना ही क्यों?
Space.com के अनुसार यान दो बार Phobos पर उतरने की कोशिश करेगा। हर बार दो तरीके आज़माए जाएंगे: एक कोर वाला नमूना-उपकरण (C-sampler) और दूसरा हवा के दबाव से मिट्टी खींचने वाला (P-sampler)। ESA बताता है कि दोनों नमूने चांद के अलग-अलग हिस्सों से लिए जाएंगे।
10 ग्राम का मतलब रसोई के हिसाब से करीब ढाई चम्मच चीनी। इतना कम इसलिए चलेगा कि ESA के प्रोजेक्ट साइंटिस्ट के मुताबिक सबसे सटीक प्रयोगशाला-मशीनें इतनी बड़ी और नाज़ुक होती हैं कि उन्हें अंतरिक्ष में भेजना संभव नहीं। नमूना धरती पर आए तो थोड़ी-सी मात्रा से भी बहुत कुछ पढ़ा जा सकता है।
Phobos पर उतरना इतना अजीब क्यों है?
Space.com के अनुसार Phobos करीब 22 किलोमीटर चौड़ा है और उसका गुरुत्व बहुत कमज़ोर है। ESA ने एक मिसाल दी है: 25 किलो का IDEFIX रोवर वहां सिर्फ़ 15 ग्राम के बराबर वज़न का होगा। सोचिए, आटे की 25 किलो की बोरी वहां ऐसी लगेगी जैसे हथेली पर तीन-चार सिक्के।
इसीलिए रोवर को लगभग 40 मीटर (130 फ़ीट) की ऊंचाई से छोड़ा जाएगा। Space.com के अनुसार वह सतह पर गिरेगा, कुछ उछाल खाएगा, फिर सीधा होकर चलना शुरू करेगा। ESA के मुताबिक इस कम गुरुत्व में उतरने, चलने और नमूना लेने के लिए खास तकनीक बनाई गई है।
जोखिम पहले भी दिख चुका है। Astronomy की रिपोर्ट याद दिलाती है कि रूस का Phobos-Grunt 2011 में पृथ्वी की कक्षा से आगे ही नहीं बढ़ सका। दूसरी ओर Space.com के अनुसार JAXA ने Hayabusa (Itokawa, जून 2010) और Hayabusa2 (Ryugu, दिसंबर 2020) से क्षुद्रग्रहों के नमूने सफलता से लौटाए हैं।
भारत के लिए MMX का मतलब क्या है?
भारत का Mangalyaan सितंबर 2014 में मंगल की कक्षा में पहुंचा था, जिसकी कहानी हमने Mangalyaan के 12 साल वाले लेख में लिखी है। पर किसी दूसरे पिंड से सैंपल धरती पर लाने का काम ISRO ने अभी नहीं किया। चांद की मिट्टी लौटाने वाली Chandrayaan-4 की योजना इसी कड़ी का पहला भारतीय कदम होगी; इसी विषय पर चांद के नमूनों पर हमारा लेख भी देखें।
MMX की साझेदारी का ढांचा भी देखने लायक है। Space.com के अनुसार NASA मिशन के अंत तक करीब 87 मिलियन अमेरिकी डॉलर लगाएगा, MEGANE और P-sampler देगा, और बदले में लौटे सैंपल का कम से कम 15% पाएगा। रोवर फ्रांस (CNES) और जर्मनी (DLR) ने मिलकर बनाया है।
हमारा आकलन है कि ISRO के लिए यह एक नमूना है: कोई एजेंसी पूरा खर्च उठाए बिना भी विज्ञान की हिस्सेदारी ले सकती है। ISRO-ESA का 2032 तक बढ़ा सहयोग ऐसी साझेदारियों का रास्ता खोल सकता है, पर किसी भारतीय हिस्सेदारी की घोषणा अभी नहीं हुई है।
अभी क्या पता नहीं है?
- उत्पत्ति का जवाब: Space.com के अनुसार NASA के Tom Statler मानते हैं कि दोनों सबूत अलग दिशा में जाते हैं, और कई मिली-जुली कहानियां भी सुझाई गई हैं।
- तत्वों की कमी का कारण: अगर Phobos में बदलाव दिखा, तो वह टक्कर की गर्मी से है या अरबों साल की अंतरिक्ष-घिसाई से, यह सैंपल से ही अलग हो पाएगा।
- नमूने में क्या होगा: JAXA के वैज्ञानिक मानते हैं कि कुछ कण शायद पुरानी टक्करों में उछलकर आए मंगल के पत्थर हों।
- सैंपलिंग की तारीख़: NASA के Lindsay Hays के अनुसार यह दिसंबर 2028 से शुरू हो सकती है, जबकि ESA की समयरेखा में उतरना 2030 में दिखता है।
आगे किन तारीख़ों पर नज़र रखें?
- 20 अक्टूबर: ESA ने बताया है कि सफल लॉन्च की पुष्टि वाली इमेज रिलीज़ उसी दिन आएगी।
- अगस्त और सितंबर 2027: मंगल की कक्षा में प्रवेश, फिर Phobos के पास की कक्षा।
- 2029 की शुरुआत: IDEFIX रोवर की रिहाई, जो असली जवाबों की पहली झलक देगी।
तब तक सवाल वही रहेगा जो ESA ने उठाया है: ये दोनों चांद पकड़े हुए पत्थर हैं या किसी पुरानी टक्कर के टुकड़े। जवाब के लिए 2031 के उस कैप्सूल का इंतज़ार करना होगा।
स्रोत: ESA, JAXA, NASA, Space.com, Jiji Press