करीब 20 लाख साल पहले, दक्षिण अफ्रीका के एक ही इलाके में दो बिल्कुल अलग दिखने वाले मानव-पुरखे साथ रहते थे। La Trobe University की टीम के नए फॉसिल से पता चला है कि इनमें से एक, Paranthropus robustus, की आबादी दूसरे, Homo erectus, से 10 गुना से भी ज़्यादा थी।

यह खोज Science journal में प्रकाशित हुई है, और यह दिखाती है कि इंसान के परिवार के पेड़ में कभी एक नहीं, कई शाखाएं एक साथ ज़िंदा थीं।

क्या हुआ: Drimolen Cave में मिला नया सबूत

यह खोज दक्षिण अफ्रीका के Drimolen Cave में हुई, जो Cradle of Humankind नाम के यूनेस्को विश्व धरोहर क्षेत्र का हिस्सा है। टीम ने यहां से 18 नए hominin फॉसिल खोजे, जिनमें DNH 127 नाम का एक वयस्क Homo erectus के खोपड़ी का हिस्सा भी शामिल है।

SciTechDaily के अनुसार इससे पहले Drimolen में Homo erectus का इकलौता सबूत DNH 134 था, जो सिर्फ 2 से 4 साल के एक बच्चे का फॉसिल था। DNH 127 पहली बार किसी वयस्क Homo erectus की पुष्टि करता है, इसलिए यह टुकड़ा भले छोटा हो, पर कहानी में एक बड़ा खाली हिस्सा भर देता है।

यह नए 18 फॉसिल अकेले Homo erectus के नहीं थे; इनमें से ज़्यादातर P. robustus के निकले, जो इस बात की पहली झलक देता है कि उस दौर में कौन-सी प्रजाति यहां ज़्यादा संख्या में घूमती थी।

Homo erectus बनाम Paranthropus robustus: कौन कैसा दिखता था

यह दोनों प्रजातियां एक ही जंगल-झाड़ी वाले इलाके में रहती थीं, पर शरीर और खान-पान की रणनीति में बहुत अलग थीं। Paranthropus robustus को अक्सर 'nutcracker man' भी कहा जाता है, क्योंकि उसके जबड़े और दांत सख्त, रेशेदार पौधे चबाने के लिए बने थे।

खूबीHomo erectusParanthropus robustus
दिमाग का आकारबड़ाछोटा
दांतछोटे मोलर दांतबड़े, चबाने में बेहद मज़बूत दांत
हमारे वंश से रिश्ताहमारा सीधा पुरखा माना जाता हैएक अलग शाखा, जो आगे खत्म हो गई

इसे एक आसान उदाहरण से समझें: P. robustus के मज़बूत जबड़े और बड़े दांत कुछ वैसे ही थे जैसे किसी के पास मोटे, कड़े बीज तोड़ने वाला भारी ग्राइंडर हो। Homo erectus के पास वैसा भारी ग्राइंडर नहीं था, पर उसके पास बड़ा दिमाग था, जो शायद उसे पत्थर के औज़ार बनाकर खाना आसान बनाने में मदद करता था।

आबादी में फर्क: 10 के मुकाबले 1

SciTechDaily के अनुसार Drimolen Cave में मिले फॉसिल के हिसाब से P. robustus की आबादी Homo erectus से 10 गुना से भी ज़्यादा रही होगी। यानी उस इलाके में घूमते हुए किसी को Homo erectus के मुकाबले P. robustus दिखना कहीं ज़्यादा आसान होता।

टीम के अनुसार Drimolen के P. robustus फॉसिल, करीब 18 लाख साल पुराने Swartkrans Cave के P. robustus फॉसिल से भी थोड़े अलग निकले। इससे पता चलता है कि यह प्रजाति भी समय के साथ धीरे-धीरे बदलती रही।

यह अनुपात सिर्फ अंदाज़ा नहीं है; यह उस जगह से मिले दांतों और खोपड़ी के टुकड़ों की गिनती पर आधारित है। इसे वैसे ही समझें जैसे किसी पुराने मेले की ज़मीन खोदने पर एक तरह के सिक्के बार-बार मिलें, तो यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वह सिक्का ज़्यादा चलता था, भले ही असली गिनती कभी पता न चले।

आखिर में किसकी जीत हुई: आज कौन बचा, कौन मिट गया

Smithsonian Magazine के अनुसार Homo erectus को वह पहली प्रजाति माना जाता है, जिसे वैज्ञानिक व्यापक रूप से हमारे अपने genus Homo का हिस्सा मानते हैं, और जो सीधे हमारे वंश से जुड़ी है। यह अफ्रीका से निकलकर करीब 18 लाख साल पहले तक Caucasus और उसके बाद चीन व Java तक पहुंच गया।

प्रजाति20 लाख साल पहलेबाद में क्या हुआ
Homo erectusकम आबादीदुनिया भर में फैला, आगे हमारा पुरखा बना
Paranthropus robustusज़्यादा आबादीकुछ लाख साल बाद पूरी तरह खत्म हो गई

यानी उस वक्त जो प्रजाति ज़्यादा आबादी में थी, वही आगे चलकर टिक नहीं पाई, और जो कम संख्या में थी, वही आगे पूरी दुनिया में फैल गई।

जीवाश्मों से ऐसी बारीक कहानियां निकलने के और उदाहरण भी मिलते रहे हैं। चीन में मिले एक बहुत पुराने समुद्री रेप्टाइल के फॉसिल में तो पेट और लिवर तक बचे मिले थे, जिसकी बात हमारी Austronaga minuta वाली स्टोरी में हुई थी। उसी तरह T. rex के शरीर के तापमान पर हमारी एक और स्टोरी भी है, जहां हड्डियों से तापमान जैसी बारीक जानकारी निकाली गई थी।

भारत के लिए मतलब: नर्मदा मानव, भारत का इकलौता इंसानी फॉसिल

भारत में अब तक सिर्फ एक ऐसा फॉसिल मिला है, जिसे किसी इंसानी पुरखे से जोड़ा जा सके। 5 दिसंबर 1982 को भूवैज्ञानिक Arun Sonakia को मध्य प्रदेश के Hathnora गांव में Narmada नदी के किनारे एक खोपड़ी का हिस्सा मिला था, जिसे Narmada Human या नर्मदा मानव नाम दिया गया।

इसे कुछ वैज्ञानिकों ने evolved Homo erectus बताया, कुछ ने Homo heidelbergensis। Sonakia के अपने अनुमान के अनुसार यह फॉसिल करीब 5-6 लाख साल पुराना है, यानी Drimolen के फॉसिल से भी कहीं ज़्यादा बाद के दौर का।

यानी जहां दक्षिण अफ्रीका के Drimolen में 20 लाख साल पहले तीन अलग-अलग प्रजातियां एक साथ रहती मिली हैं, भारत के पास अपने बहुत बाद के दौर का सिर्फ एक अधूरा फॉसिल है। हमारा आकलन है कि जहां दक्षिण अफ्रीका में एक साथ कई प्रजातियों के दर्जनों फॉसिल मिल चुके हैं, भारत की अपनी कहानी अभी सिर्फ इस एक फॉसिल पर टिकी है।

अभी क्या पता नहीं, आगे क्या देखा जाएगा

  • यह दोनों प्रजातियां आपस में कैसा व्यवहार करती थीं, एक-दूसरे से बचती थीं या किसी तरह साथ रहती थीं, यह अभी साफ नहीं है।
  • P. robustus के पूरी तरह खत्म होने की ठीक वजह अभी तय नहीं है।
  • Drimolen में अभी और खुदाई बाकी है; टीम और वयस्क Homo erectus फॉसिल ढूंढने की कोशिश में है।

20 लाख साल पहले जो प्रजाति संख्या में कम थी, वही आज हमारी कहानी बन गई, और जो ज़्यादा थी, वह सिर्फ चट्टानों में दबे दांतों की शक्ल में बची है। कभी-कभी इतिहास बताता है कि संख्या में ज़्यादा होना टिके रहने की गारंटी नहीं होती। Drimolen जैसी जगहों की खुदाई अभी जारी है, और हर नया फॉसिल इस पूरी कहानी में एक टुकड़ा और जोड़ सकता है।

स्रोत: SciTechDaily, Smithsonian Magazine, Science Journal, La Trobe University

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