COP31 से पहले EU और भारत के रुख में वित्त पर सीधा टकराव दिख रहा है। 8 अक्टूबर को फ़िजी के नादी में COP31 की पूर्व-बैठक (Pre-COP) खत्म हुई, और भारत के पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि ऊंची महत्वाकांक्षा के साथ वित्त, तकनीक-हस्तांतरण और क्षमता-निर्माण भी चाहिए।
चार दिन बाद, 12 अक्टूबर को Reuters ने EU के आंतरिक ड्राफ्ट के हवाले से लिखा कि नई क्लाइमेट फंडिंग की ‘कोई गुंजाइश नहीं’ है।
इस लेख में दोनों पक्षों को एक तालिका में आमने-सामने रखा गया है, और 300 अरब डॉलर के पुराने वादे को रोज़ के आंकड़े में बदला गया है। दोनों के बीच एक साझा शब्द भी है: ‘अमल’ (implementation)।
EU के ड्राफ्ट में क्या है?
Reuters के अनुसार EU का आंतरिक दस्तावेज़ अंटाल्या में 9–20 नवंबर के COP31 में एक ‘mitigation package’ की मांग करेगा, यानी देशों के मौजूदा वादों को असली कदमों में बदलना। ड्राफ्ट आयरलैंड ने बनाया है, जिसके पास EU की घूर्णन अध्यक्षता है। इसके मुख्य बिंदु:
- उत्सर्जन घटाने की बातचीत वाले मंच (mitigation work programme) को 2040 तक बढ़ाना; यह मंच इसी साल खत्म होना है
- UN की उस पुष्टि का जवाब कि दुनिया 1.5°C का लक्ष्य चूकेगी
- सार्वजनिक टकराव से बचकर देशों के साथ अमल पर काम (EU राजनयिकों के हवाले से)
- नई क्लाइमेट फंडिंग पर ‘कोई गुंजाइश नहीं’
आयरलैंड के जलवायु मंत्री Darragh O'Brien ने Reuters से कहा कि EU जीवाश्म ईंधन से बदलाव और बिजली-आधारित साधनों (electrification) पर साझेदारियां मज़बूत करेगा। यानी पैकेज की भाषा तकनीकी और व्यावहारिक है, नए वादों की नहीं।
Reuters के मुताबिक पिछले साल ब्राज़ील के COP30 में उत्सर्जन पर मज़बूत प्रतिबद्धताएं नहीं बनी थीं, और EU इसी वजह से इस बार अलग रास्ता चुन रहा है। 1.5°C की स्थिति पर इस विश्लेषण में अलग से बात हो चुकी है।
भारत ने नादी में क्या कहा?
ANI के अनुसार यादव ने COP31 में ‘महत्वाकांक्षी और संतुलित’ नतीजे की मांग की, जिसमें ऊंची महत्वाकांक्षा के साथ वित्त, तकनीक और क्षमता-निर्माण जुड़े हों और अमल राष्ट्रीय रास्तों का सम्मान करे। उन्होंने COP31 की वार्ता के अध्यक्ष, ऑस्ट्रेलिया के मंत्री Chris Bowen से भी मुलाकात की। पूर्व-बैठक की सह-मेज़बानी ऑस्ट्रेलिया, फ़िजी और तुवालु ने की।
The Policy Edge के अनुसार यादव ने Article 6 भी उठाया, जो देशों के बीच स्वैच्छिक सहयोग का ढांचा है और वित्त जुटाने के रास्ते खोल सकता है। उसी विश्लेषण में भारत की स्थिति तीन सवालों को जोड़ती दिखती है: कितनी कार्रवाई, उसका वित्त कैसे आए, और बदलाव के रास्ते पर कितनी छूट रहे।
आमने-सामने: EU बनाम भारत
| मुद्दा | EU (आंतरिक ड्राफ्ट, Reuters) | भारत (Pre-COP31, 7–8 अक्टूबर) |
|---|---|---|
| मुख्य ज़ोर | मौजूदा वादों को अमल में बदलना, ‘mitigation package’ | ऊंची महत्वाकांक्षा, पर वित्त-तकनीक-क्षमता के साथ |
| नया वित्त | ‘कोई गुंजाइश नहीं’ | वित्त को महत्वाकांक्षा के साथ जोड़ने की मांग |
| राष्ट्रीय रास्ते | देशों के मौजूदा वादे लागू कराना | अमल राष्ट्रीय रास्तों का सम्मान करे |
| बातचीत का तरीका | सार्वजनिक टकराव से बचना (राजनयिकों के अनुसार) | अध्यक्ष और सभी पक्षों के साथ काम की तैयारी |
तालिका में दोनों कॉलम ‘अमल’ पर मिलते हैं। फ़र्क इस पर है कि अमल का खर्च किसके हिस्से आए, और Reuters के अनुसार यही पहलू EU को गरीब देशों से दूर कर सकता है।
Reuters यह भी लिखता है कि बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं और जीवाश्म ईंधन उत्पादकों ने सख्त कार्रवाई के आर्थिक वृद्धि और विकास पर असर को लेकर चिंता जताई है। भारत का ‘राष्ट्रीय रास्तों’ वाला वाक्य इसी बहस के करीब बैठता है, क्योंकि उसका सीधा अर्थ है कि हर देश बदलाव अपनी रफ़्तार और तरीके से करे।
300 अरब डॉलर का पुराना वादा रोज़ के हिसाब में
The Tribune के अनुसार 2024 में COP29 ने विकासशील देशों के लिए 2035 तक कम से कम 300 अरब डॉलर सालाना का लक्ष्य (NCQG) तय किया था, जिसमें विकसित देश अगुआई करेंगे। 300 अरब डॉलर को 365 दिन में बांटें तो रोज़ करीब 82 करोड़ डॉलर बैठता है।
Reuters की रिपोर्ट के अंश से यह साफ नहीं होता कि ‘कोई नई फंडिंग नहीं’ का मतलब इस लक्ष्य के ऊपर की रकम से है या किसी और दायरे से। इसलिए इसे पुराने वादे से पीछे हटना नहीं पढ़ना चाहिए; यह एक ड्राफ्ट की भाषा है।
भारत के लिए इसका मतलब
Climate Current के विश्लेषण के अनुसार विकासशील देशों में साफ ऊर्जा की परियोजनाएं ऊंची उधारी लागत, कमज़ोर बिजली ढांचे और सीमित निवेश-पहुंच की वजह से महंगी पड़ती हैं। यही तर्क भारत के रुख की नींव है। हमारा आकलन है कि नए वित्त के बिना भारत के लिए Article 6 जैसे रास्ते और मौजूदा वित्त-स्रोत ज़्यादा अहम हो जाएंगे।
- मौका: मंच 2040 तक चले तो बिजली, परिवहन, उद्योग और खेती जैसे क्षेत्रों पर बातचीत जारी रहेगी (Climate Current)
- चुनौती: अमल की मांग बढ़े और वित्त न बढ़े, तो लागत देश के बजट और कंपनियों पर पड़ेगी
- देखने लायक: 1.5°C से ऊपर का दौर, जिसकी Copernicus की ताज़ा गिनती पर पहले चर्चा हुई
जो अभी साफ़ नहीं
- EU का दस्तावेज़ ड्राफ्ट है; अंतिम रुख बातचीत में बदल सकता है।
- मंच को 2040 तक बढ़ाने पर भारत का अलग से क्या कहना है, यह यादव के इन बयानों में नहीं दिखता।
- गरीब देश इस पैकेज को कैसे लेंगे: Reuters ने सिर्फ इतना लिखा है कि यह रुख उन्हें EU से दूर कर सकता है।
- जीवाश्म ईंधन से बदलाव की रफ़्तार: Climate Current के अनुसार यह सवाल अब भी अनसुलझा है कि कितनी तेज़ी से और खर्च किसके हिस्से।
इन चारों बातों का जवाब नवंबर से पहले नहीं मिलेगा। तब तक EU का ड्राफ्ट और भारत का बयान दोनों शुरुआती पोज़िशन भर हैं, अंतिम समझौते की शर्तें नहीं।
आगे क्या देखें?
- 9–20 नवंबर: अंटाल्या में COP31; Anadolu के अनुसार नेताओं का सम्मेलन 11–12 नवंबर को
- इस साल के अंत तक mitigation work programme का फैसला, क्योंकि उसकी मौजूदा अवधि खत्म हो रही है
- पहले हफ्ते में वित्त पर EU और विकासशील देशों के सार्वजनिक बयान
- तुर्किये की अध्यक्षता का तरीका: Anadolu के अनुसार वह संवाद और सहमति-आधारित नतीजों का वादा कर रही है
फिलहाल तस्वीर दो अलग बयानों की है, जो एक ही शब्द ‘अमल’ पर टिके हैं पर उसकी कीमत पर असहमत हैं। असली फ़ैसला नवंबर की मेज़ पर होगा।
स्रोत: Reuters, ANI, The Tribune, The Policy Edge, Climate Current, Anadolu Agency