क्या दुनिया के जंगल अब बचने लगे हैं? FAO की नई State of the World's Forests (SOFO) 2026 रिपोर्ट का जवाब आधा हां और आधा ना है। हर साल कटने वाले वनों का क्षेत्रफल 1990 के दशक से काफी घटा है, पर शुद्ध वन-नुकसान 2015 से 2025 के बीच फिर बढ़ा है, और 46 करोड़ हेक्टेयर से ज़्यादा वन क्षरित हैं।
पहले बनाम अब: कटाई और शुद्ध नुकसान
FAO के Global Forest Resources Assessment 2025 के आंकड़ों पर टिकी इस रिपोर्ट के अनुसार वनों की कटाई (deforestation) 1990-2000 में सालाना 17.6 मिलियन हेक्टेयर थी, जो 2015-2025 में 10.9 मिलियन हेक्टेयर रह गई। शुद्ध वन-नुकसान की कहानी अलग है, क्योंकि उसमें नए लगे या अपने आप उगे जंगल घटाए जाते हैं।
| अवधि | सालाना कटाई (मिलियन हेक्टेयर) | सालाना शुद्ध वन-नुकसान (मिलियन हेक्टेयर) |
|---|---|---|
| 1990-2000 | 17.6 | 10.7 |
| 2000-2015 | 13.6 | 3.68 |
| 2015-2025 | 10.9 | 4.12 |
ये आंकड़े Green Initiative और The Press Pad में दर्ज हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 1990 से 2025 के बीच कुल करीब 489 मिलियन हेक्टेयर वन कटाई में गए, जबकि पूरी दुनिया में वनों का क्षेत्र अब लगभग 4.14 अरब हेक्टेयर है, यानी धरती की ज़मीन का करीब 32%।
कटाई घटी, फिर शुद्ध नुकसान क्यों बढ़ा
सवाल का जवाब तालिका की आखिरी दो पंक्तियों में छिपा है। दोनों कॉलम एक साथ नहीं गिरे, और यही दुनिया के जंगलों की मौजूदा उलझन है।
हमारा आकलन है कि इसे सबसे आसान तरीके से बैंक खाते की तरह समझा जा सकता है। कटाई खर्च है और वन-वृद्धि आमदनी। 2000-2015 से 2015-2025 के बीच कटाई करीब 20% घटी (13.6 से 10.9), पर शुद्ध नुकसान करीब 12% बढ़ा (3.68 से 4.12)।
इसका मतलब है कि वन-वृद्धि का घटना कटाई के घटने से तेज़ रहा। Green Initiative के अनुसार शुद्ध नुकसान इसी वजह से बढ़ा कि वनों के नए फैलाव की रफ्तार कटाई के मुकाबले ज़्यादा धीमी पड़ी। यानी "कटाई कम" का मतलब हर जगह "जंगल ज़्यादा" नहीं निकलता।
क्षरण का दायरा: 1.56 अरब हेक्टेयर ज़मीन
वन सिर्फ पेड़ों का जमावड़ा नहीं हैं। IndexBox के सार के अनुसार वे करीब 714 गीगाटन कार्बन जमा रखते हैं, ज़मीन की जैव विविधता के 80% तक को आसरा देते हैं और दुनिया की लगभग एक-तिहाई आबादी का खाद्य सुरक्षा व आजीविका का सहारा हैं। इसीलिए क्षरण का हिसाब सिर्फ हेक्टेयर में नहीं देखा जाता।
FAO की ही खबर के अनुसार दुनिया में 1.56 अरब हेक्टेयर ज़मीन क्षरित है, जिसमें 460 मिलियन हेक्टेयर वन-भूमि शामिल है। इसकी वजहों में आबादी का बढ़ना, भूमि-उपयोग में बदलाव और संसाधनों की बढ़ती मांग गिनाई गई हैं। खास तौर पर एशिया की 583 मिलियन हेक्टेयर ज़मीन (19%) 2019 में क्षरित थी, यह GS Times और Khan GS के सार में दर्ज है।
Insights on India के सार के अनुसार प्राकृतिक रूप से उगने वाले जंगल, जो वैश्विक वन क्षेत्र का करीब 92% हैं, 1990 से 2025 के बीच 324 मिलियन हेक्टेयर घटे। यह फर्क इसलिए अहम है कि नए लगाए बागान और सदियों पुराने प्राकृतिक वन पर्यावरण में एक जैसा काम नहीं करते। जैव विविधता पर इसका असर हमने WWF की Living Planet Report वाली रिपोर्ट में देखा था।
वादे बनाम ज़मीन: बहाली कितनी आगे बढ़ी
Green Initiative के अनुसार देशों ने एक अरब हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन की बहाली का वादा किया है, पर रिपोर्ट किए गए वन-बहाली संकल्पों में से करीब 23% ही लागू हो पाए हैं। अलग-अलग आंकड़े इस तरह हैं:
| पैमाना | मिलियन हेक्टेयर |
|---|---|
| FAO को बताए गए वन-बहाली संकल्प | करीब 190 |
| इनमें से जिन पर काम चल रहा है | करीब 44 |
| 2030 तक अतिरिक्त बहाली की ज़रूरत | करीब 470 |
यानी 190 में से 44 पर काम होने का मतलब करीब 23% है, जो रिपोर्ट के आंकड़े से मेल खाता है। असली दूरी इस बात में है कि 2030 के लक्ष्य के लिए अभी 470 मिलियन हेक्टेयर और चाहिए।
भारत के लिए मतलब
कई स्रोतों के अनुसार भारत ने जैव विविधता कन्वेंशन (CBD) को सौंपी अपनी सातवीं राष्ट्रीय रिपोर्ट में 18.9 मिलियन हेक्टेयर वन और भूदृश्य को बहाली के तहत बताया है। यह चीन के 127.4 मिलियन हेक्टेयर के बाद दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। The Press Pad के अनुसार FRA 2025 में भारत कुल वन क्षेत्र में नौवें स्थान पर है।
Insights on India के अनुसार भारत, चीन, इथियोपिया, इंडोनेशिया और तुर्किये मिलकर FRA 2025 में रिपोर्ट की गई वैश्विक वन-बहाली का करीब 70% हिस्सा संभालते हैं। यानी बहाली का काम कुछ ही देशों पर टिका है।
इस दूसरे स्थान को सावधानी से पढ़ना चाहिए। यह देशों की अपनी रिपोर्ट पर टिका है और इसमें वन के साथ अन्य भूदृश्य भी शामिल हैं। बहाली के साथ-साथ कटाई और वेटलैंड-क्षरण जैसे स्थानीय दबाव भी बने रहते हैं, जैसा हमने असम की बाढ़ में वेटलैंड और जंगल कटाई की रिपोर्ट में देखा था।
FAO के महानिदेशक QU Dongyu ने रिपोर्ट की प्रस्तावना में लिखा कि बहाली सिर्फ पर्यावरण की प्राथमिकता नहीं, बल्कि लचीली कृषि-खाद्य व्यवस्था और ग्रामीण विकास में एक रणनीतिक निवेश है। यह तर्क बहाली को बजट की बहस में लाता है, सिर्फ संरक्षण की बहस में नहीं।
जो अभी पता नहीं
रिपोर्ट के उपलब्ध सार में भारत के लिए अलग से कटाई बनाम शुद्ध नुकसान का आंकड़ा नहीं मिला, इसलिए ऊपर की तालिका वैश्विक है। यह भी साफ नहीं कि 18.9 मिलियन हेक्टेयर में से कितना असली वन है और कितना कृषि-वानिकी जैसी दूसरी ज़मीन।
तुलना में सावधानी भी ज़रूरी है: कुछ स्रोत शुद्ध नुकसान को 1990 के दशक से घटा हुआ बताते हैं, कुछ 2000-2015 से बढ़ा हुआ। दोनों बातें सही हैं, पर तुलना की अवधि अलग है, इसलिए हेडलाइन पढ़ते समय आधार-वर्ष देखना ज़रूरी है।
आगे क्या देखें
पहला, COP31, जिसे हमने EU और भारत के जलवायु वित्त पैकेज की रिपोर्ट में कवर किया था। वहां वन-बहाली के संकल्प और पैसे का सवाल फिर उठ सकता है। दूसरा, क्या 2030 तक के लिए ज़रूरी 470 मिलियन हेक्टेयर के लक्ष्य की तरफ देशों की रफ्तार बढ़ती है। तीसरा, भारत अपनी बहाली के आंकड़े में असली वन का हिस्सा अलग से बताता है या नहीं।
जंगलों की कहानी अब सिर्फ कटाई रोकने की नहीं रही। असली परीक्षा यह है कि कटे और बिगड़े हुए जंगलों को वापस लाने के वादे ज़मीन पर कितने उतरते हैं।
स्रोत: FAO SOFO 2026, FAO Newsroom, Green Initiative, The Press Pad, Insights on India, Jokta Academy